दुनिया को भाया संगमरमरी इमारतों को बचाने का ये भारतीय फार्मूला

लेजर तकनीक से संगमरमर को पहुंच रहे नुकसान के मद्देनजर यूरोपीय देशों ने प्राकृतिक पद्वति को अपनाने पर जोर दिया है। यही नहीं, देश में भी संगमरमर से बनी इमारतों की सफाई अब ताज की तर्ज पर मडपैक से ही की जाने लगी है।
दुनिया के सातवें अजूबे के दागों को मिटाने और पीलापन हटाने के लिए दो साल से किए जा रहे मडपैक ट्रीटमेंट को अब दुनिया भर के स्मारक अपना रहे हैं। यूनेस्को के साथ कई देशों के पुरातत्व विशेषज्ञ मडपैक को जानने और परिणाम देखने के लिए ताज का दौरा कर चुके हैं।
तकनीक की जगह अब विशेषज्ञ प्राकृतिक पद्वति को ही अपनाने की संस्त़ुति कर रहे हैं। आने वाले दिनों में दुनिया भर के स्मारकों में ताज की तरह ही मडपैक ट्रीटमेंट नजर आ सकता है।
अधीक्षण पुरातत्वविद डा. भुवन विक्रम ने बताया कि लेजर और बायोलोजिकल तरीकों का प्रयोग यूरोप के देश कर रहे हैं, लेकिन ताजमहल के पूरी तरह से रसायन रहित मडपैक ट्रीटमेंट ने उन्हें भी इसका प्रयोग करने के लिए विकल्प दिया है।
लेजर से संगमरमर की सतह खुरदुरी पड़ जाने, पहली परत के लगभग जल जाने के दुष्प्रभाव के मद्देनजर सभा प्रबंधन ने मडपैक ट्रीटमेंट को ही उपयुक्त पाया। सभा अब दीवारों की सफाई और दाग मिटाने के लिए परंपरागत और प्राकृतिक मुल्तानी मिट्टी का लेप ही प्रयोग कर रही है।





