सेक्स पावर बढ़ाने के काम आ रहे हैं भारत के ये कछुए, कई गुना बढ़ जाती है मर्दानगी

भाग दौड़ भरी जिंदगी में पुरुषों में सबसे ज्यादा असर उनके प्रजनन को लेकर पैदा हो गई है। आज लोग पैसा चाहे जितना कमा लें लेकिन उनके अंदर एक औलाद पैदा करने की ताकत खत्म होती जा रही है। इसी लिए सेक्स पावर बढ़ाने के लिए लोग डॉक्टरों से लेकर मंदिर मस्जिद और भभूत तक इस्तेमाल कर रहे हैं। रोज नए नए प्रयोग कर रहे हैं। ऐसे में इन दिनों एक और बात सबसे ज्यादा सामने आई है। वो है कछुओं को लेकर, जी हां कहा जाता है कि जो लोग कछुओं का मीट खाते हैं, उनमें अजब सी शक्ति आ जाती है।

सेक्स पावर बढ़ाने के काम आ रहे हैं भारत के ये कछुए, कई गुना बढ़ जाती है मर्दानगीजबसे लोगों में चर्चा शुरु हुई है कि कछुओं में मर्दाना ताकत बढ़ाने का गुण हैं तब से बड़े और महानगरों समेत देश विदेश में भी भारतीय कछुओं की मांग बढ़ गई है, जिसके बाद सेक्स पावर बढ़ाने के लिए इनकी तस्करी जोरों पर हो रही है। पुलिस ने कई स्थानों से तस्करों को पकड़कर जेल भी भेजने का काम किया है। कछुओं की मांग सबसे ज्यादा देश के बड़े शहर मुम्बई, नई दिल्ली, कोलकाता आदि जगहों पर हैं। यहां पर कछुए का मांस मनमानी दाम पर बिकता है। लोगों का मानना है कि इसका मांस खाने से शरीर में एक अलग तरीके से ताकत आती है। कछुओं के तस्कर प्रदेश के जौनपुर,आजमगढ़, बलिया, गोरखपुर, बस्ती, प्रतापगढ़, इलाहाबाद आदि स्थानों पर मछुआरों से साठगांठ कर नदी, तालाब से पकड़ कर उसे बोरे में रखकर ट्रेन से ले जाते हैं। यही वजह है कि मुखबिरी हो जाने पर यह कभी-कभी पकड़ भी लिए जाते हैं। एक मछुआरे के मुताबिक कछुओं को मारने के लिए खौलते पानी में उसे जिंदा डाला जाता है।

जबकि सरकार नदियों से जल प्रदूषण खत्म करने के लिए विलुप्त कछुओं को बचाने व उनकी संख्या बढ़ाने को लेकर काम कर रह है। यूपी में लखनऊ के कुकरैल स्थित कछुआ प्रजनन केंद्र से अब तक लगभग 21 हजार कछुओं को गंगा सहित देश के अनेक नदियों में प्रवाहित किया जा चुका है। सरकारकछुओं को नदियों में छोड़ती दूसरी तरफ कछुआ तस्कर मछुआरों की मदद से इन कछुओं को महंगे दामों पर बेच दे रहे हैं।

देश में 15 प्रजाति कछुओं के पाये जाते हैं लेकिन कुकरैल के इस केंद्र पर लगभग 11 प्रजाति के कछुओं के संवर्धन किया जाता है। कछुओं की जिन प्रजाति का यहां प्रजनन किया गया उसमें सबसे महत्वपूर्ण दुर्लभ प्रजाति के कछुए का नाम काला काठा है। इस कछुए को इन्टरनेशनल यूनियन फार कन्जव्रेशन आफ नेचर एंड नेचुरल रिसोर्सेज ने सबसे विलुप्त प्रजाति के श्रेणी में रखा है। दुर्लभ प्रजाति के कछुए में साल (तिलकधारी) भी है जिसकी पहचान इनके शरीर में तिलक की तरह रेखा बनी होती है। इस केंद्र पर पचेड़ा,  सदरी व रामदेखी प्रजाति के भी दर्जनों कछुआ मौजूद हैं।

वन्य जीव विशेषज्ञ राजेश मणि का कहना है कि कछुओं का प्रजनन माह सितम्बर होता है। इनकी मादा कछुआ 15 से 20 अण्डा देती हैं। पृथ्वी में रहने वाली प्राणियों में सबसे अधिक आयु कछुए की होती है जो लगभग 180 वर्ष होता है।

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