छात्रा को क्लास में आया पीरियड् बेंच पर लगा खून, टीचर ने देखा तो…!

नई दिल्लीः महिलाओं को मासिक धर्म (पीरियड्स) के दौरान जहां अलग अलग राज्य सरकारें और प्राइवेट कंपनियां छुट्टी देने की बात कह रही है. वहीं कुछ ऐसे मामले भी हमारे सामने आ रहे हैं जहां लोग इसे लेकर किसी भी लड़की, छात्र, महिला को कठघरे में खड़ा कर देते है. ताजा मामला एक स्कूल से जुड़ा है, यह घटना बेहद दर्दनाक रही. क्योंकि 12 साल की एक मासूम ने सिर्फ इसलिए आत्महत्या कर ली क्योंकि उसे कथित रूप से क्लास टीचर द्वारा ताना सुनने को मिला था.12 साल की इस मासूम बच्ची की आत्महत्या समाज के मुंह पर तमाचे जैसी है.
दरअसल स्कूल में पढ़ने वाली ये लड़की माहवारी (पीरियड्) में थी. जाहिर है कि इतनी कम उम्र में उसे अपने शरीर में आ रहे बदलावों के बारे में जानकारी नहीं रही होगी. ये लड़की तमिलनाडु के पालायमकोट्टाइ के सेंथिल नगर के एक स्कूल में सातवीं क्लास में पढ़ती थी. इसी दौरान जब वो स्कूल पहुंची तो उसके शरीर से निकला खून उसके कपड़ों और स्कूल के बेंच पर लग गया.
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इस गुनाह के लिए स्कूल की महिला टीचर ने उसे कथित रूप से सबके सामने इतना जलील किया कि वो इस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर सकी और 25 फीट ऊंची अपने पड़ोसी की छत से कूदकर अपनी जिंदगी खत्म कर ली. आत्महत्या की ये दिल दहला देने वाली घटना तमिलनाडु के तिरुनलेवली में हुई.
सुसाइड नोट से पता चला कारण
पहले तो लड़की के माता पिता को अंदाजा ही नहीं था कि उसकी बेटी ने ये कदम क्यों उठाया, लेकिन जब उन्हें बेटी का सुसाइड नोट मिला तो उन्हें घटना की पूरी जानकारी मिल गई. लड़की ने अपने पत्र में लिखा कि स्कूल में मेरी दोस्तों ने मुझे बताया कि तुम्हारे कपड़ों और बेंच पर पीरियड का खून लगा हुआ है, इसके बाद जब छात्रा ने टीचर से बाथरुम जाने की इजाजत मांगी तो टीचर उस पर चिल्ला पड़ी.
पूरे क्लासरुम के सामने उसे टीचर ने फटकार लगाई और कहा कि उसे अब तक सैनिटरी पैड्स पहनने का तरीका नहीं समझ में आया है. रिपोर्ट्स के मुताबिक टीचर उसे प्रिंसिपल के पास भी ले गई, यहां भी बच्ची को ‘लापरवाह’ होने के लिए डांट और फटकार का सामना करना पड़ा. तिरुनेलवेली के कलेक्टर ने जांच के आदेश दिए हैं. आत्महत्या का मामला भी दर्ज कर लिया गया है.
यहां सोचने वाली बात है कि एक तरफ हम महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं, लेकिन आज भी हमारे समाज में होने वाली ऐसी घटनाएं ऐसे सच को उजागर करती है जिससे या तो हम वाकिफ नहीं है या फिर हम वाकिफ होना नहीं चाहते हैं. दरअसल हम नहीं चाहते हैं कि ये सच्चाई हमारे साथ चले. हम इसे अपने से अलग रखने की कोशिश करते है. हर उस महिला-लड़की-किशोरी को हम अपने से दूर रखते हैं जो मासिक धर्म में हो. जबकि ये सच्चाई हमारे आपके साथ भी जुड़ी रहती है.





