पंजाब में हुई धार्मिक ग्रंथों की बेअदबी मामले में बढ़ सकती हैं सुखबीर की मुश्किलें

चंडीगढ़। पंजाब में अकाली-भाजपा सरकार के कार्यकाल में हुई धार्मिक ग्रंथों की बेअदबी के मामलों में शिअद अध्यक्ष व पूर्व उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। मामलों की जांच के लिए गठित जस्टिस रंजीत सिंह आयोग ने सरकार को पत्र लिखकर आयोग के गठन व संबंधित कमीशन आफ इंक्वायरी एक्ट 1952 में संशोधन करने की मांग की है।पंजाब में हुई धार्मिक ग्रंथों की बेअदबी मामले में बढ़ सकती हैं सुखबीर की मुश्किलें

आयोग ने पश्चिम बंगाल व मध्य प्रदेश की तरह इसे और पावरफुल बनाने की मांग की है। अभी यदि कोई आयोग के पास पेश नहीं होता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई करने की पावर नहीं है, लेकिन संशोधन के बाद यह पावर मिल जाएगी। आयोग ने बीते दिनों सुखबीर व भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष विजय सांपला को बेअदबी की घटनाओं को लेकर सबूत पेश करने के लिए तलब किया था। दोनों ही नेता आयोग के सामने पेश नहीं हुए। इसके मद्देनजर आयोग ने सरकार से उक्त मांग की है। आयोग ने दोनों को बेअदबी की घटनाओं में विदेशी ताकतों के हाथ होने संबंधी राज्यपाल को सौंपे गए ज्ञापन के बाद तलब किया था।

आयोग का मानना है कि चूंकि दोनों नेताओं ने ज्ञापन सौंपा था इसलिए विदेशी ताकतों का हाथ होने के पर्याप्त सबूत उनके पास हैं। इसी सबूत को आयोग को पेश करने के लिए दोनों नेताओं को तलब किया गया था, लेकिन दोनों पेश नहीं हुए, बल्कि आयोग को पत्र लिखकर सूचित कर दिया था कि इस प्रकार के मामलों को रोकने व जांच की जिम्मेदारी पुलिस की होती है।

पुलिस ने भी स्वीकार किया था कि विदेशी ताकतों का इसमें हाथ है। उसके पास सबूत हैं। उस समय डीजीपी सुरेश अरोड़ा थे जो अब भी उसी पद पर हैं। आयोग का मानना है कि अगर किसी के पास सबूत हैं और वह पेश नहीं कर रहा है तो यह भी एक्ट के अनुसार गलत है। इस मामले को लेकर आयोग ने बीते दिनों जिमनी आदेश भी पारित किए हैं जिसमें दोनों नेताओं को तलब किए जाने के बाद भी न आने की बाबत भी लिखा है। अगर सरकार ने आयोग की मांग मानकर इसे पावरफुल बना दिया तो निश्चित तौर पर सुखबीर की मुश्किलें बढऩा तय है। इस बारे में आयोग के चेयरमैन जस्टिस रंजीत सिंह ने कोई भी टिप्पणी करने से इन्कार किया है।

संशोधन के बाद बढ़ जाएगी आयोग की पावर

एक्ट में संशोधन के बाद आयोग की पावर बढ़ जाएगी। आयोग के समक्ष पेश न होने या फिर पेश होकर उसके खिलाफ उल्टी-सीधी बयानबाजी करने पर तत्काल गिरफ्तारी की जा सकेगी। इसके अलावा सजा व जुर्माने का अधिकार भी आयोग को मिल जाएगा।

अकाली दल ने विस में भी उठाया था मुद्दा

शिरोमणि अकाली दल ने विधानसभा के बजट सत्र में आयोग की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगाते हुए मुद्दा उठाया था कि आयोग का गठन सरकार ने निजी हितों को पूरा करने के लिए किया है, न कि बेअदबी की घटनाओं की सही जांच को लेकर। अकाली नेताओं ने मांग की थी कि आयोग का चेयरमैन सुप्रीम कोर्ट के जज को बनाया जाए।

अकाली दल के महासचिव बिक्रम सिंह मजीठिया ने यह भी आरोप लगाए थे कि चेयरमैन कांग्रेस सरकार के करीबी होने के साथ-साथ नेता प्रतिपक्ष सुखपाल खैहरा के भी करीबी रिश्तेदार हैं। मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने मजीठिया के आरोपों व मांगों को लेकर सदन में ही स्पष्ट कर दिया था कि आरोप सरासर राजनीति से प्रेरित हैं।

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