मायावती से शुरू होकर अखिलेश राज तक होता रहा 2000 करोड़ का घोटाला, सामने आए 76 नेताओं के सम्बन्धियों का नाम
नोएडा। बसपा और सपा शासन काल में यमुना एक्सप्रेस-वे के किनारे करीब डेढ़ हजार बीघा बेशकीमती जमीन को बैकलीज के नाम पर रसूखदारों को बांट दिया गया। जांच में यह भी पता चला है कि इस जमीन को लेकर तकरीबन 2000 करोड़ रुपये का घोटाला हुआ है।
प्रभावशाली और सत्ता से जुड़े लोगों ने अधिग्रहण की कार्रवाई के बाद किसानों से जमीन खरीदी। बाद में सत्ता का दबाव बनाकर जमीन को आबादी के नाम पर छुड़वा कर बैकलीज कराई गई। जांच में सामने आया है कि बैकलीज (रजिस्ट्री) करते समय नियमों की पूरी तरह से अनदेखी की गई। बैकलीज नीति स्थानीय किसानों के लिए बनाई गई थी। नीति में स्पष्ट प्रावधान है कि बैकलीज का लाभ यमुना प्राधिकरण क्षेत्र से बाहर के लोगों को नहीं मिलेगा।
जिन लोगों के पक्ष में बैकलीज की गई, उनमें 80 फीसद लोग दिल्ली, हरियाणा, कर्नाटक व गाजियाबाद के रहने वाले हैं। इस घोटाले में 76 लोगों के नाम सामने आए हैं। इनमें अधिकांश लोग सत्ता के करीबी नेता और अधिकारियों के रिश्तेदार और सगे संबंधी बताए जा रहे हैं।इनके संबंध प्राधिकरण में तैनात रहे अधिकारी और नेताओं से जोड़े जा रहे हैं। मंगलवार को प्राधिकरण एसीईओ व जांच अधिकारी अमरनाथ उपाध्याय ने अपनी रिपोर्ट मेरठ मंडल के कमिश्नर व प्राधिकरण चेयरमैन डा. प्रभात कुमार को सौंप दी। इस घोटाले में कई अधिकारी और सफेदपोश की गर्दन फंस सकती है।
जगपुर अफजलपुर व दनकौर यमुना एक्सप्रसे-वे के किनारे बसे होने के कारण प्राइम लोकेशन के माने जाते हैं। अन्य गांवों के मुकाबले, इनकी जमीन महंगी है। जगनपुर में कुछ दिन पहले करोड़ों रुपये का चकबंदी घोटाला सामने आया था। अब बैकलीज घोटाला खुला है।दनकौर व जगनपुर अफजलपुर गांव की जमीन का अधिग्रहण 2010 में किया गया था। अरबों रुपये मूल्य की करीब डेढ़ हजार बीघा जमीन को प्राधिकरण क्षेत्र से बाहर के लोगों ने 2011 से 2015 के बीच किसानों से खरीद लिया। बाद में सत्ता का दबाव बनाकर जमीन को अधिग्रहण से मुक्त कराने के लिए बैकलीज करा ली गई।
प्राधिकरण चेयरमैन डा. प्रभात कुमार ने 14 गांवों के मामलों की जांच कराई। सर्वाधिक गड़बड़झाला जगनपुर अफजलपुर गांव में प्रकाश में आया है। इस गांव में करीब पांच सौ बीघा कृषि भूमि को आबादी बताकर कब्जे की कार्रवाई धारा नौ में छोड़ा गया। करीब पांच सौ बीघा जमीन को बैकलीज में छोड़ा गया। चेयरमैन यमुना प्राधिकरण व कमिश्नर मेरठ डॉ. प्रभात कुमार का कहना है कि हेरा-फेरी की जांच रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई की जाएगी। जमीन को वापस प्राधिकरण के नाम दर्ज किया जाएगा। गड़बड़ी करने वालों में जिनके नाम सामने आएंगे, उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होगी। किसी को बख्शा नहीं जाएगा। फर्जीवाड़ा करने वालों को जेल भेजा जाएगा।
बाहरी लोगों के पक्ष में ज्यादा हुई बैकलीज
दोनों जगह 80 फीसद आबादी की बैकलीज कर्नाटक, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली व महाराष्ट्र के लोगों के नाम की गई। जबकि, आबादी छोड़ने का निर्णय सिर्फ यमुना प्राधिकरण क्षेत्र के गांवों के किसानों के लिए हुआ था।
खसरा खतौनी में लिखा है बाहर का पता
जमीन के अभिलेख खसरा खतौनी में भू-स्वामियों का पता दूसरे शहरों का दर्ज है। प्राधिकरण की उप कमेटी ने उन्हें स्थानीय बताकर डीएम और एसएसपी को अपनी रिपोर्ट भेजी।
मौके पर खाली पड़ी है जमीन
एसीईओ की जांच रिपोर्ट में यह भी खुलासा हुआ है कि जिस जमीन पर लोगों की संघन आबादी बताई गई, वह इस समय मौके पर खाली पड़ी हुई है। इस तरह के करीब 70 फीसद मामले प्रकाश में आए हैं।
क्या है बैकलीज
प्राधिकरण ने कृषि भूमि के साथ किसानों की उस जमीन का भी अधिग्रहण कर लिया था, जिस पर उनके मकान बने हुए थे। अधिग्रहण के बाद राजस्व अभिलेखों में प्राधिकरण का नाम दर्ज हो गया। इसके विरोध में किसानों ने आंदोलन किया। चूंकि आबादी वाली जमीन पर प्राधिकरण का नाम दर्ज हो गया था, इसलिए उस पर फिर से किसानों के नाम दर्ज करने के लिए बैकलीज (रजिस्ट्री) की गई। इसके लिए किसानों से कोई स्टांप पत्र नहीं लिया गया। सिर्फ सौ रुपये के स्टांप पत्र पर बैकलीज की गई।
किसानों की आड़ में हुआ खेला गया यह खेल
प्रदेश में तत्कालीन बसपा सरकार ने किसानों को लाभ पहुंचाने के लिए बैकलीज नीति बनाई थी। इसके तहत प्राधिकरण क्षेत्र के अधिसूचित गांवों में रहने वाले मूल निवासियों की आबादी की जमीन को बैकलीज के जरिये वापस किया जाना चाहिए। आरोप है कि सत्ता से जुड़े लोगों ने अधिकारियों के साथ मिलकर इसका दुरुपयोग किया। आंदोलन के बावजूद मूल किसानों की नाममात्र के लिए बैकलीज से आबादी छोड़ी गई। वहीं सत्ता से जुड़े लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए बड़े पैमाने पर जमीन की बंदरबांट की गई।





