Platelets दान करने की प्रक्रिया के दौरान जिंदगी बचा रहे ये युवा, दूसरों को ऐसे कर रहे जागरूक

बीमारी से जूझते मरीजों को खून उपलब्ध कराने के लिए कई युवा मदद करते हैं, लेकिन इससे इतर शहर में कुछ ऐसे युवा भी हैं, जो सिंगल डोनर प्लेटलेट्स (एसडीपी) उपलब्ध करा रहे हैं। प्लेटलेट्स दान कर यह युवा एमवाय अस्पताल के बोन मैरो यूनिट में भर्ती बच्चों सहित अन्य मरीजों को जीवनदान दे रहे हैं। बोन मैरो ट्रांसप्लांट, डेंगू, चिकनगुनिया सहित ऐसी कई बीमारियां, जिसमें प्लेटलेट्स तेजी से कम होते हैं। खून की प्लेटलेट्स चढ़ाए जाने की आवश्यकता पूरी नहीं होने पर मरीज की जान तक जा सकती है। शहर के 10 से 12 युवा मरीजों की जान बचाने के लिए आगे आए हैं। यह युवा एक माह में तीन से चार बार या जरूरत पड़ने पर प्लेटलेट्स दान कर रहे हैं।
एमवायएच में एक साल पहले खोली गई बोन मैरो ट्रांसप्लांट यूनिट में अभी तक 35 बच्चों का बोन मैरो ट्रांसप्लांट हुआ है, जिसमें इन लोगों ने हर बार बुलाए जाने पर सहयोग किया। इसके अलावा डेंगू, चिकनगुनिया या अन्य बीमारियों से ग्रस्त मरीजों की मदद के लिए भी ये लोग आगे रहते है।
युवाओं के लिए बन रहे प्रेरणा
नौकरी के लिए मुंबई से इंदौर आए डेविड फेलिक्स मेंडोंस ने अभी तक 230 बार एसडीपी दान किया है। रक्तदान के प्रति जागरूक होकर इंदौर की निशा सिंह ने पहली बार एसडीपी दान किया। मुस्कान ग्रुप के प्रकाश रोछाणी ने 103 बार रक्त और एसडीपी दान किया है। रक्तदान एक कोशिश मानव कल्याण समिति के मनीष पिपले ने 52 बार एसडीपी दान किया है। संस्था विजय रक्तिका के मनोहर खत्री ने 51 बार, ओंकार दांगी ने 21 बार, प्रयास शिंदे ने 25 बार, अभिषेक घावरी ने 27 बार, अमित पंजाबी ने 38 बार और शशिकांत लसार ने 22 बार एसडीपी दान किया है।
मशीन के जरिये निकालते हैं प्लेटलेट्स
दान करने वाले व्यक्ति के ब्लड से प्लेटलेट्स को एक मशीन के माध्यम से निकाला जाता है। इस प्रक्रिया के दौरान लाल रक्त कणिकाएं और प्लाज्मा वापस दान करने वाले व्यक्ति के शरीर में पहुंच जाता है। इसके लिए एमवाय अस्पताल में बाकायदा मशीन भी लगी है, जिसमें यह सारी प्रक्रिया होती है।
स्वस्थ व्यक्ति में 1 लाख 25 हजार होना चाहिए प्लेटलेट्स
एक स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में एक लाख 25 हजार से चार लाख के बीच खून में प्लेटलेट्स होना जरूरी है। यह प्लेटलेट्स शरीर में रोजाना टूटती हैं और नई भी बनती हैं। कई लोग ऐसे होते हैं, जो किसी बीमारी से ग्रस्त होते हैं और उनका शरीर प्लेटलेट्स नहीं बना पाता है। ऐसे में इसकी संख्या 10 से 20 हजार तक पहुंच जाती है, जो खतरनाक स्थिति होती है।
अभी भी लोग नहीं हैं जागरूक
खून से प्लेटलेट्स को निकालने को लेकर अभी लोग जागरूक नहीं हैं, इसलिए जितनी बड़ी संख्या में रक्तदान करने वाले मिलते हैं, उतनी संख्या में एसडीपी दान करने वाले सामने नहीं आते। लोग यही सोचते हैं कि खून से प्लेटलेट्स निकालने पर ये वापस नहीं बनती, जबकि हकीकत तो यह है कि एक से दो दिनों में ही शरीर में प्लेटलेट्स दोबारा बन जाती हैं। वहीं पांच से सात दिनों के बाद दोबारा दान की जा सकती हैं। वहीं खून दान करने के बाद, अगली बार तीन महीने के बाद ही दान किया जा सकता है। जिनका वजन 60 किलो से अधिक होता है, ऐसे युवा प्लेटलेट्स दान कर सकते हैं।
फेसबुक के माध्यम से भी मांग रहे मदद रक्तदानकर्ता
शशिकांत लसार ने बताया कि एमवाय अस्पताल में इस समय खून के साथ प्लेटलेट्स दान करने वाले कम ही आते हैं। ऐसे में हम फेसबुक के माध्यम से भी मदद मांग रहे हैं। अस्पताल से फोन आने पर कई लोगों को कॉल लगाकर दान के लिए कहा जाता है। जो पास में होते हैं, वे तुरंत पहुंचते हैं।
गरीब मरीजोें के लिए बन रहे बहुत बड़ा सहारा
एसडीपी दान करने के लिए युवा आगे आ रहे हैं। यह गरीब मरीजों के लिए बहुत बड़ा सहारा है। एमवाय अस्पताल में स्पेशल प्रोसेस के तहत एसडीपी दान होता है, जिसमें तीन से चार घंटे में पूरी प्रक्रिया होती है। स्पेशल मशीन से जांच और खून फिल्टर होता है। इसमें दान करने वाले व्यक्ति को कोई नुकसान नहीं होता। डेंगू, चिकनगुनिया, किमोथैरेपी व बोन मैरो ट्रांसप्लांट के मरीजों को प्लेटलेट्स मिलने से उन्हें फायदा हो रहा है।





