अब सुखबीर बादल को उनकी सियासी विरासत को संभालने के साथ साथ पंथक विरासत को भी संभालना पड़ेगा..

वयोवृद्ध नेता और अकाली दिग्गज प्रकाश सिंह बादल के निधन के बाद अब सुखबीर बादल को उनकी सियासी विरासत को संभालने के साथ साथ पंथक विरासत को भी संभालना पड़ेगा। हालांकि प्रकाश सिंह बादल पंथक नेता के रूप में जाने नहीं जाते लेकिन पिछले अढ़ाई दशक में जिन्होंने जिस तरह से अपने समकालीन नेताओं को हाशिए पर धकेल कर सभी बड़े संस्थानों पर अपनी धाक जमा ली थी उन्हें अब अपने पास बनाए रखना सुखबीर बादल के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी।

दरअसल 1980 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने की सरकार को भंग कर दिया तो पंजाब में डेढ़ दशक तक काला दौर चला। 1985 में सुरजीत सिंह बरनाला के नेतृत्व में पंजाब में सरकार जरूर बनी लेकिन प्रकाश सिंह बादल हाशिए पर थे। यह वह दौर था जब पंजाब की सियासत पर गर्म दलीयों का कब्जा हो गया था और प्रकाश सिंह बादल सरीखे धैर्यवान लोगों ने अपने आप को पीछे रख लिया।
1989 के संसदीय चुनाव में सिमरनजीत सिंह मान के नेतृत्व में हुए चुनाव में सभी नए लोग चुनाव जीत गए जबकि बड़े बड़े अकाली दिग्गज जिनमें बलवंत सिंह रामूवालिया, मनजीत सिंह कलकत्ता, सुखदेव सिंह ढींडसा , गुरदेव सिंह बादल और शमिंदर सिंह जैसे नेता भी अपनी जमानतें भी नहीं बचा सके। 1991 में जब फिर से विधानसभा चुनाव होने लगे तो प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने ऐन मौके पर ये चुनाव रद कर दिए और 1992 में जब चुनाव करवाए गए तो अकाली दल ने इसका बहिष्कार कर दिया। लिहाजा मात्र 8 फीसदी वोटों के जरिए बेअंत सिंह सरकार बनाने में कामयाब हो गए।
प्रकाश सिंह बादल ने रचा इतिहास
1995 तक बादल सत्ता की मेन स्ट्रीम से बाहर रहे लेकिन जैसे ही 1995 में उन्होंने अपने भतीजे मनप्रीत बादल को गिदड़बाहा सीट पर चुनाव लड़वाकर जीत दिलवाई, सत्ता में आने का उनका रास्ता साफ होने लगा। 1997 में भाजपा के साथ मिलकर प्रकाश सिंह बादल ने पंजाब के इतिहास में अब तक की सबसे बड़ी जीत हासिल की और तभी से उन्होंने सिख पंथ के सभी अहम अदारों पर अपनी धाक जमानी शुरू कर दी। पार्टी प्रधान भी वह खुद थे और मुख्यमंत्री भी।
शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के प्रधान गुरचरण सिंह टोहरा जरूर थे लेकिन काबिज ग्रुप प्रकाश सिंह बादल का ही था इसीलिए जैसे ही गुरचरण सिंह टोहरा ने प्रकाश सिंह बादल को पार्टी का प्रधान किसी और को बनाने की बात कही, बादल ने ऐसी हवा बना दी कि टोहरा बाहर हो गए।
पिता की विरासत आगे बढ़ाना सुखबीर की जिम्मेदारी
उसके बाद एसजीपीसी पर भी पूरी तरह से बादल ग्रुप का ही कब्जा हो गया जो अब तक जारी है। यानी पार्टी , सरकार और एसजीपीसी तीनों पर ही बादल की धाक जम गई। अब इस धाक को सुखबीर बादल कैसे बनाए रख पाएंगे यह सबसे बड़ा सवाल है। चूंकि बादल बहुत धैर्यवान और सूझबूझ वाले नेता रहे हैं और अपने राजनीतिक दुश्मनों की सफाई भी वह बड़े तरीके से करते रहे हैं। ये गुण सुखबीर बादल को भी अपने अंदर विकसित करने होंगे। अकाली दल में यह ट्रांसफॉर्मेंशन का दौर है जब दल की सीनियर लीडरशिप धीरे धीरे बाहर हो रही है और अगली पीढ़ी आ रही है।





