#MeToo में फंसे उत्तराखंड के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की छह दिन तक आखिर कौन बना ढाल? बड़ा सवाल

महिला कांस्टेबल के यौन उत्पीड़न में फंसे एएसपी परीक्षित कुमार की ढाल आखिर कौन बना हुआ था।#MeToo में फंसे उत्तराखंड के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की छह दिन तक आखिर कौन बना ढाल? बड़ा सवाल

यह सवाल इसलिए खड़ा हुआ है क्योंकि पीड़िता के शिकायत करने के छह दिन तक एएसपी अपने पद पर बने हुए थे और पूरे प्रकरण पर हरिद्वार पुलिस कुंडली मारकर बैठी रही।

चर्चा है कि देहरादून में तैनात एक आईजी इस पूरे प्रकरण को रफा दफा करने में एड़ीचोटी का जोर लगाए हुए थे और वह परीक्षित कुमार की नई ताजपोशी की पैरवी भी पुलिस मुख्यालय में बड़े ही जोरदार ढंग से कर रहे थे। 

शिकायत वापस लेने का भारी दबाव बनाया जा रहा था

दबी जुबां कई पुलिस अफसर यह भी बोल रहे हैं कि पीड़िता पर भी शिकायत वापस लेने का भारी दबाव बनाया जा रहा था लेकिन वह अपनी शिकायत पर अडिग रही।

यह बात हैरान करने वाली ही है। जब 29 दिसंबर को महिला कांस्टेबल ने एएसपी परीक्षित कुमार के खिलाफ बाकायदा यौन उत्पीड़न की शिकायत लिखित में दे दी थी तो फिर वह पद पर कैसे बने रहे।

सवाल इसलिए भी खड़े होना लाजिमी है कि पूरे प्रकरण को आखिरकार क्यों छिपाए रखा और एएसपी को तुरंत पद से क्यों नहीं हटाया गया।

आईजी जी जान से जुटे थे कि पूरा प्रकरण किसी भी तरह से निपट जाए

चर्चा ये भी पुलिस मुख्यालय में तैनात एक रसूखदार आईजी ही एएसपी की ढाल बने हुए थे। आईजी जी जान से जुटे थे कि पूरा प्रकरण किसी भी तरह से निपट जाए। क्योंकि वह परीक्षित कुमार को देहरादून या हरिद्वार जिले में बतौर एएसपी तैनात करने की पैरवी में भी पूरे दमखम के साथ जुटे थे।

महिलाओं को इंसाफ दिलाने का दम भरने वाले पुलिस महकमे में ही जब यौन उत्पीड़न का शिकार हो रही महिला कांस्टेबल की आवाज को दबाने की षड्यंत्र रचा जा रहा है, तो एक आम पीड़िता को इंसाफ मिलने की बात बेमानी सी ही है। वो तो, शुक्रवार को यदि मीडिया के समक्ष यह प्रकरण न पहुंचता तो एएसपी की पद से विदाई भी न होती और न ही निष्पक्ष जांच की उम्मीद थी।

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