Makar Sankranti : भूलकर भी न पूजें सूर्यदेव के चरण, पूजा की यह गलती कर देगी कंगाल

प्रत्यक्ष देवता भगवान सूर्य की साधना सभी तरह के पाप, रोग, भय आदि से मुक्त करने वाली है। प्रात:काल भगवान भास्कर को अर्घ्य देने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है, लेकिन इनकी साधना में एक विशेष चीज का ख्याल रखना बहुत जरूरी है। जिस तरह तमाम देवी-देवताओं की पूजा के लिए कुछ विशेष नियम बनाए गये हैं, उसी तरह सूर्य की साधना का अपना विधान है। जिन्हें नजरंदाज करने पर शुभ फल की बजाय तमाम तरह की विपत्तियों का सामना करना पड़ सकता है।Makar Sankranti : भूलकर भी न पूजें सूर्यदेव के चरण, पूजा की यह गलती कर देगी कंगाल

इस कारण पत्नी संज्ञा ने छोड़ा था सूर्य का साथ
शास्त्रों में सूर्यदेव की प्रतिमा का पूजन करने के दौरान उनके चरणों के दर्शन की सख्त मनाही है। मान्यता है कि सूर्य देवता के चरणो के दर्शन से दरिद्रता आती है और जातक पूरी तरह से कंगाल हो जाता है। सूर्यदेव के चरण दर्शन नहीं किए जाने के पीछे एक पौराणिक कथा है। जिसके अनुसार भगवान सूर्य का विवाह प्रजापति की पुत्री संज्ञा से हुआ था। चूंकि भगवान भास्कर का इतना ज्यादा तेज था कि उनके पास आना तो दूर उन्हें सामान्य आंखों से देखना भी मुमकिन नहीं था। ऐसे में संज्ञा अपनी छाया को सूर्यदेव की सेवा में लगाकर अपने पिता के पास वापस लौट गईं।

भगवान विश्वकर्मा ने इस तरह कम किया तेज
संज्ञा के जाने के बाद जब सूर्य भगवान को इस बात का अहसास हुआ कि उनके साथ उनकी पत्नी नहीं बल्कि उनकी छाया रह रही है तो उन्होंने तुरंत अपनी पत्नी को बुलाकर इसका कारण पूछा। जब संज्ञा ने अपनी पीड़ा सूर्यदेव को बताई तो उन्होंने तुरंत देवताओं के शिल्पकार भगवान विश्वकर्मा को बुलाकर अपने तेज को कम करने का आग्रह किया।

भूलकर भी न करें चरणों के दर्शन
सूर्यदेव के आग्रह पर भगवान विश्वकर्मा ने चाक की मदद से उनका पूरे शरीर का तेज तो कम कर दिया लेकिन पैरों पर चाक चढ़ाना भूल गये। उनके पैरों का तेज पूर्ववत् ही रहा। यही कारण है कि सूर्यदेव की प्रतिमा आदि के निर्माण में उनके चरण दर्शाना पूरी तरह से निषिद्ध है। सूर्य साधना में कभी भूलकर भी उनके चरण के दर्शन एवं उनकी पूजा नहीं की जाती है। जो जातक ऐसा करता है, उसे दु:ख-दारिद्रय जैसे घोर कष्टों का सामना करना पड़ता है।

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