छतरपुर से भोपाल को जोड़ने वाली सड़क से भीतर की ओर मुश्किल से पांच किलोमीटर दूर बसा है, खड़गांय. यह गांव प्रधानमंत्री सड़क से जुड़ा हुआ है. इस गांव की दलित बस्ती सहित अन्य बस्तियों का नजारा यहां के हाल बयां करने के लिए काफी है. आलम यह है कि बस्ती के अधिकांश घरों पर ताले लटके हैं, और अगर कोई बचा है तो बुजुर्गों और बच्चों की देखरेख के लिए एक महिला.

छतरपुर जिला मुख्यालय से लगभग 13 किलोमीटर दूर के इस गांव के हाल बुंदेलखंड के अन्य गांव जैसे ही हैं. पानी के अभाव में खेती नहीं हो पाई है, हैंडपंप भी कम पानी देने लगे हैं. गांव में किसी तरह का रोजगार है नहीं, कर्ज का बोझ है सो अलग. मध्यप्रदेश सरकार ने बुंदेलखंड की सभी तहसीलों को सूखाग्रस्त तो घोषित कर दिया है, मगर किसी तरह के राहत कार्य शुरू नहीं हुए हैं.

गांव की सुकरती देवी का चेहरा झुर्रियों में बदल चुका है, गांव के लोग बताते हैं कि उनकी उम्र लगभग 100 वर्ष के आसपास है. वे बताती हैं, “एक लड़का यहीं रहकर मजदूरी कर रहा है तो दो लड़के पूरे परिवार सहित दिल्ली चले गए हैं और अपना पेट भर रहे हैं. वृद्धावस्था पेंशन भी एक साल से नहीं मिली है. अब तो यह उम्मीद ही छोड़ दी है कि कभी यह पेंशन मिलेगी भी.”

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रिजवा अहिरवार (60) के दो बेटे हैं, दोनों ही अपनी-अपनी पत्नी के साथ कमाने खाने दिल्ली चले गए हैं. रिजवा के जिम्मे छोड़ गए हैं दो बेटियां. रिजवा की पत्नी की मौत हो चुकी है. वह बताता है, “पूरे गांव का यही हाल है, पानी की कमी के चलते खेती हुई नहीं, काम है नहीं, इस स्थिति में सभी के लड़के और बहू काम की तलाश में गांव छोड़ गए हैं.”

हरजू (65) अपनी पत्नी के साथ गांव में है. एक बेटा और बहू छोटे-छोटे तीन बच्चों के साथ काम की तलाश में बाहर गए हैं. वे बताते हैं, “राशन मिल जाता है, तो पेट भरने का इंतजाम आसान होता है, बेटा पैसे भेज देता है तो दूसरे काम हो जाते हैं, यहां तो हम डुकरा-डुकरिया (बुजुर्ग दंपति) पूरी तरह भगवान के भरोसे हैं.”

इस गांव की हालत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां की उप सरपंच मंजू अहिरवार भी काम की तलाश में पति के साथ दिल्ली गई है. मंजू का पति बंसी लाल अहिरवार अभी गांव आया हुआ है. वह बताता है, “उसकी साढ़े तीन एकड़ जमीन है, मगर पानी न होने पर खेती नहीं कर सका, किसी पड़ोसी से पानी मांगो तो वह उसके बदले में पैसे की मांग करते हैं. उसकी स्थिति पैसे देने की है नहीं. इसके अलावा उस पर कर्ज भी है, लिहाजा उसने गांव से बाहर जाकर काम करने का फैसला लिया. वहां से कुछ कमाई कर लाएगा तो कर्ज भी चुक जाएगा.”

गांव के नौजवान संजय शर्मा की मानें, तो यहां सबसे ज्यादा पिछड़े वर्ग के परिवार हैं. बारिश अच्छी नहीं हुई तो खेती नहीं हो पाई. लोगों पर कई तरह के कर्ज हैं, गांव में अन्य कोई काम है नहीं, ऐसे में उनके पास बाहर जाने के अलावा कोई रास्ता ही नहीं बचा. यही कारण है कि गांव के अधिकांश घरों के बाहर ताले लटके हुए हैं.

बुंदेलखंड विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष रामकृष्ण कुसमारिया सहित अन्य सदस्य भी यह मानते हैं कि क्षेत्र में जल संकट निवारण के लिए बड़े पैमाने पर कार्य कराए जाने की जरूरत है. प्राधिकरण की शुक्रवार की बैठक में तय हुआ कि बुंदेलखंड क्षेत्र में मौजूद चंदेलकालीन व अन्य तालाबों के गहरीकरण का कार्य अभी से शुरू कर दिया जाना चाहिए. बीडीए की ओर से हर तालाब के गहरीकरण में 10 से 15 लाख रुपये व्यय किए जाएं, ताकि तालाब भी गहरा हो सके और किसानों को तालाब की उपजाऊ मिट्टी भी मिल सके.

बुंदेलखंड में कुल 13 जिले आते हैं, उनमें से सात जिले उत्तर प्रदेश और छह जिले मध्यप्रदेश के हैं. इन सभी जिलों का हाल लगभग एक जैसा है, पानी का संकट है. खेती हो नहीं पा रही, राहत कार्य शुरू नहीं हुए. परिणामस्वरूप परिवारों का गांव छोड़कर जाने का सिलसिला बना हुआ है.