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जानिए हनुमान जी के जीवन का स्पष्ट चित्रण

तब हनुमंत कही सब राम कथा निज धाम।

अपने आप को वानर (बद्धि प्रधान साधक) से भक्तशिरोमणि मे रूपातंरित करपाने मे सफल रहने वाले साधक श्री हनुमान के जीवन का स्पष्ट चित्रण रामचरितमानष के सुदंरकाण्ड मे मिलता हैं।रूपातंरण प्रक्रिया कि कथा सुदंरकाण्ड जिसमे जीवन रूपातंरण के गूढ सिद्धांत निहित है को पढकर या समझ कर आनंदित-लाभांवित होना स्वाभाविक है किंतु वर्तमान परिवेश मे भी इस अनुपम कथा का अद्भुत संयोग दिखता हैं। जो हमे यह समझने पर विवश कर देता है कि हमारे धार्मिक ग्रंथो मे दी गयी कथाएँ जिनमे सिद्धांत और प्रयोग निहित है वे केवल और केवल मानव विकास के लिए ही स्पष्ट मार्गदर्शन मात्र हैं। बस अंतर इतना कि जिस परीक्षा मे श्री हनुमान जी उत्तरीण हुए उसमे हम फेल हो जाते है।क्योकि हम हमेशा विश्राम यानि विषयो के आयाम मे ही जीवन भर श्रम करते रह जाते है और हनुमान जी कहते है…”राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहॉ विश्राम।” (अपने जीवन का आध्यतमिक उत्थान करना ही रामकाज है)


सुरसा रूपी सर्पिनी हमारी बल-बुद्धि को जानने के लिए रोज हमारी इच्छाओ-कामनाओ के रूप मे हमे खॉ रही है और हम उसका भोजन बन सुरसा का ही पेट भरने मे लगे हैं। हमारे जीवन मे यह क्षण कभी आता ही नही कि सुरसा रूपी माया हमे अपनी परीक्षा से उत्तरीण कर इस बात का प्रमाण पत्र दे सके कि “राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान।” क्योकि हम तो अपनी बल-बुद्धि का विकास मात्र विषयो के विकास मे ही लगाते है और अंत मे काल का ग्रास बन कर समाप्त हो जाते हैं।
प्रसंगवश सुदंरकाण्ड कि कुछ चौपाईयो दोहो का हिंदी भावार्थ हमे शिव जी कि दृष्टि से लंका का चित्रण तब के और आज के भी संसार और समाज को हु-बहू चित्रत करता है।सुदंरकाण्ड मे श्री हनुमान जी जब लंका पहुँच कर जो दृश्य देखते है वही दृश्य हमे आज के भौतिक संसार मे भी स्पष्ट दिखाई पडता है प्राय: हम रोजाना इन सब बातो से रूबरू भी होते रहते हैं।
{ गोस्वामी जी लिखते है.. “शिव जी कहते है- हे उमा इसमे वानर हनुमान कि कुछ बड़ाई नही हैं।यह प्रभु (ज्ञान) का प्रताप है,जो काल को भी खा जाता है। पर्वत पर चढकर उन्होने लंका देखी। बहुत ही बडा किला है। वह अत्यन्त ऊँचा है,उसके चारो ओर समुद्र है। सोने के परकोटो (चहारदीवारी) का प्रकाश हो रहा है।विचित्र मणियो से जड़ा हुआ सोने का परकोटा है, उसके अंदर बहुत से सुदंर- सुदंर घर है। चौराहे,बाजार,सुदंर मार्ग और गलियाँ है; सुदंर नगर बहुत प्रकार से सजा हुआ है। हाथी,घोडे,खच्चरो के समूह पैदल और रथो के समूहो को कौन गिन सकता है।(जैसे आजकल कार बाईक ट्रक टैम्पो बसो को कौन गिन सकता हैं।) अनेक रूपो मे राक्षसों का दल है,उनकी अत्यंत बलवती सेना वर्णन करते नही बनती।( जैसे-भष्टाचार और लूटमार से स्वहित मे दूसरो का अहित करते प्राय: लोगो को गला काट प्रतियोगिता मे भाग लेते हुए देखा जा सकता हैं।)
वन,बाग,उपवन, फुलवाडी ,तालाब,कुएँ और बावलियॉ सुशोभित हैं। मनुष्य,नाग,देवताओ और गन्धर्वो की कन्याएँ अपने सौन्दर्य से मुनियों के भी मनों को मोहे लेती हैं। कही पर्वत के समान विशाल शरीर वाले बडे ही बलवान पहलवान गरज रहे हैं। वे अनेकों अखाडों मे बहुत प्रकार से भिड़ते और एक दूसरे को ललकारते हैं। भयंकर शरीर वाले करोड़ों यत्न कर के नगर की चारो दिशाओ मे रखवाली करते हैं। कहीं दुष्ट राक्षस भैंसो, मनुष्यो,गायो,गदहो,और बकरो को खा रहे हैं। तुलसीदास ने इनकी कथा इसीलिए कुछ थोडी-सी कही है कि ये निश्चय ही श्रीरामचन्द्र जी के बाण रूपी तीर्थ मे शरीर त्यागकर परमगति पावेंगे।>}
इस कथानक को अगर हम ईमानदारी से बिना किसी भेदभाव व दूसरो को बुरा और अपने को अच्छा समझने कि भूल करने के बजाए क्या भौतिकता कि प्राप्ति के लिए राक्षस योनि मे अपने आप को परिवर्तित होते हुए देख सकते हैं। आजके परिवेश मे हम क्या है इसका निर्णय स्वा विवेक पर निर्णय आपका कि आप क्या है और आपको क्या होना चाहिए।अंत मे एक दोहे के साथ सभी अग्रजो,मित्रो,अनुजो को श्री हनुमान जन्मोत्सव कि अनंत शुभकामनाएँ।..

तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग।।

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