कर्नाटक चुनाव: यह 3 कारण काफी BJP को अगली सरकार बनाने के लिए

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कर्नाटक चुनावों के मद्देनजर अभी तक जितने भी ओपिनियन पोल हुए हैं, उनमें से अधिकांश ने त्रिशंकु विधानसभा की संभावना जताई है. इसके उलट द टाइम्‍स ऑफ इंडिया के मशहूर स्‍तंभकार स्‍वामीनाथन एस अंकलेसरिया अय्यर ने अलहदा विचार पेश करते हुए कहा है कि कर्नाटक में अगली सरकार बीजेपी की ही बनेगी. टाइम्‍स ऑफ इंडिया के रविवार के अंक में अपने ‘स्‍वामीनॉमिक्‍स’ (Swaminomics) कॉलम में उन्‍होंने बाकायदा तीन वजहों के आधार पर कर्नाटक में बीजेपी की अगली सरकार की बात कही है:

कर्नाटक चुनाव: यह 3 कारण कभी BJP को अगली सरकार बनाने के लिए

1. उन्‍होंने अपने आर्टिकल में पहला कारण कर्नाटक में सत्‍ता विरोधी लहर को बताया. स्‍वामीनाथन का आकलन है कि इस वक्‍त पूरे देश में सत्‍ता विरोधी लहर की भावना है. इसी लहर के कारण पिछले साल यूपी और उत्‍तराखंड में बीजेपी सत्‍ता में आई और उत्‍तर-पूर्वी राज्‍यों में बढि़या प्रदर्शन किया. बीजेपी का समर्थन करने वाले इसे पार्टी की लहर के रूप में देखते हैं, जबकि वास्‍तव में ये सत्‍ता विरोधी लहर है. आखिरकार इसी सत्‍ता-विरोधी लहर के कारण बीजेपी-शिरोमणि अकाली दल सरकार पंजाब की सत्‍ता से बाहर हो गई. ये लहर इस बात का सिग्‍नल देती है कि वोटर बुनियाद रूप से नाराज है और इस कारण कर्नाटक की सत्‍ता से कांग्रेस की विदाई हो सकती है.

2. पिछले विधानसभा चुनाव(2013) की तुलना में इस बार बीजेपी एकदम अलग दिख रही है. उस दौरान अवैध खनन घोटाले में नाम आने के कारण मुख्‍यमंत्री बीएस येद्दियुरप्‍पा को मुख्‍यमंत्री की कुर्सी से पार्टी को हटाना पड़ा और इसके साथ ही उनके करीबी रेड्डी बंधुओं को भी हटाया गया. इसका नतीजा यह हुआ कि बीजेपी तीन धड़ों में बंट गई-एक आधिकारिक पार्टी, दूसरा येदियुरप्‍पा की पार्टी और तीसरा आदिवासी नेता बी श्रीरामुलु का ग्रुप. श्रीरामुलु को रेड्डी बंधुओं का बेहद करीबी माना जाता है. बीजेपी में इस तरह के विभाजन के चलते कांग्रेस आसानी से जीत गई. लेकिन इस बार बीजेपी के ये सभी विभाजित धड़े एकजुट हो गए हैं और इसके साथ ही पीएम नरेंद्र मोदी जैसे करिश्‍माई नेता का पार्टी को अतिरिक्‍त लाभ मिल रहा है.

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3. तीसरा कारण धन है. बीजेपी की इस वक्‍त 19 राज्‍यों में सत्‍ता है और इसके अगले साल आम चुनाव जीतने की भी संभावना है. ऐसे में जीतने वाले घोड़े पर दांव लगाने वालों के कारण इसके पास चंदे की कमी नहीं है. इसके उलट कांग्रेस केवल दो बड़े राज्‍यों (पंजाब और कर्नाटक) की सत्‍ता में है. इसके अगला आम चुनाव जीतने की संभावना भी काफी कम है. इसलिए दान देने वाले बिजनेस दाताओं के लिए भी यह आकर्षक नहीं है. इस लिहाज से कांग्रेस की फंड एकत्र करने के लिए कर्नाटक पर निर्भरता है. इससे बीजेपी के इस तंज को कुछ वैधानिकता मिलती है कि सिद्धारमैया सरकार 10% दलाली खाने वाली सरकार है.

इसके साथ ही बीजेपी के पास विचारधारात्‍मक आधार पर प्रतिबद्ध स्‍वयंसेवकों की पूरी फौज है, जिनकी कोई वेतन नहीं मिलता. इसके उलट कांग्रेस के पास ऐसे स्‍वयंसेवकों का अभाव है और उनकी कोई विचारधारा भी नहीं है. ऐसे में जो इलेक्‍शन एजेंट हायर किए जाएंगे, उनमें निष्‍ठा का अभाव होगा. हालांकि केवल धन या स्‍वयंसेवकों के दम पर ही चुनाव नहीं जीते जाते. लेकिन सत्‍ता विरोधी लहर के साथ जब ये कारक जुड़ जाते हैं तो निर्णायक भूमिका निभाते हैं.

 
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