नई दिल्ली.जेएनयू स्टूडेंट यूनियन के लिए शुक्रवार को इलेक्शन प्रॉसेस पूरी हो गई। स्टूडेंट्स ने यूनिवर्सिटी के अंदर बनाए गए 4 पोलिंग बूथ पर शुक्रवार सुबह 10 से शाम 6 बजे तक वोट डाले। इसके बाद देर रात तक वोटों की गिनती भी कर ली गई। नतीजों का एलान 11 सितंबर को होगा। इस बार सिर्फ 57.6% वोटिंग हुई, जो पिछले साल 59.6% के मुकाबले 2% कम है। यहां कुल 8 हजार वोटर हैं, इस बार 4637 वोट पड़े।
प्रेसिडेंट के लिए 7 कैंडिडेट मैदान में…
– जेएनयू में इस बार भी बैलेट पेपर से चुनाव कराए गए। यहां कड़ा मुकाबला आइसा-डीएसएफ, एआईएसएफ और एबीवीपी के बीच है। जेएनयूएसयू प्रेसिडेंट के लिए मुकाबले में सात कैंडिडेट हैं। फिलहाल प्रेसिडेंट आइसा का है, जिसका एसएफआई के साथ गठबंधन है।
– कांग्रेस की स्टूडेंट विंग एनएसयूआई पहले की तरह इस बार भी फीकी नजर आई। वहीं एबीवीपी ने कैंपस में अपने वर्चस्व को फिर से पाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है। सबसे ज्यादा समर्थकों की भीड़ लेफ्ट यूनिटी, बपसा और एबीवीपी के साथ दिखी।
डीयू में 12 सितंबर को वोटिंग
– 2012 के बाद पहली बार दिल्ली यूनिवर्सिटी स्टूडेंट यूनियन (DUSU) और जवाहरलाल नेहरू स्टूडेंट यूनियन (JNUSU) के इलेक्शन अलग-अलग दिन रखे गए हैं। डीयू में 12 सितंबर को वोटिंग होगी। इसके एक दिन पहले जेएनयू इलेक्शन के नतीजों का एलान होगा।
– बता दें कि दोनों यूनिवर्सिटी में आमतौर पर सितंबर के दूसरे शुक्रवार को चुनाव कराने की परंपरा रही है।
डिबेट में बीएसपी-एबीवीपी सपोर्टर भिड़े
– तेज बारिश के चलते प्रेसिडेंशियल डिबेट कुछ देर के लिए रोकनी पड़ी। रात डेढ़ बजे सवाल-जवाब का सेशन शुरू हुआ। बीएसपी की शबाना अली और एबीवीपी की निधि त्रिपाठी की डिबेट के दौरान दोनों पार्टियों के सपोर्टर आपस में भिड़ गए।
– वहां मौजूद सिक्युरिटी गार्ड्स ने किसी तरह हालात पर काबू पाया। प्रेसिडेंशियल डिबेट को सुनने के लिए कई विदेशी स्टूडेंट भी जेएनयू कैंपस पहुंचे थे।
प्रेसिडेंशियलडिबेट में उठे ये मुद्दे
शबाना अली (बीएसपी)
-केंद्र में जब से बीजेपी की सरकार आई है, तब से कई जगहों पर दलितों पर हमला किया जा रहा है। गोरक्षा के नाम पर लोगों से खुलेआम मारपीट की जा रही है। राइट विंग फोर्सेज का अटैक यूनिवर्सिटी कैंपस में भी आने लगा है। हमारे कैंपस में प्रदर्शन के अधिकार को खत्म किया जा रहा है। आज भी दलितों को दबाया जा रहा है।
फारूख आलम (निर्दलीय)
– ये राइट आई…लेफ्ट आई सब राजनीति में खो गई, अब आई हमारी बारी, क्योंकि छात्र नीति है सब पर भारी। दो सालों में नजीब मामले को हटाओ, सिर्फ यह बताओ कि दामोदर हॉस्टल का मेन गेट कब खुलवा दोगे। 9 बजे के बाद वॉशरूम के रास्ते से गुजरना पड़ता है। आपको सिर्फ दलितों, माइनॉरिटी, ओबीसी के नाम पर वोट लेना आता है।
निधि त्रिपाठी (एबीवीपी)
– इस बार जेएनयू में एबीवीपी ही छाएगा। दवा लेने जाएं, तो सिर्फ पैरासिटामॉल थमा दी जाती है। यह मुद्दा काफी अहम है। जेएनयू यूनियन ने पिछले कुछ सालों में कोई काम नहीं किया। वामपंथी दल का काम है सिर्फ हंगामा करना लेकिन हमारा काम मुद्दों का हल निकालना है। हम कैंपस में सेनेटरी पैड नैपकिन मशीनों की भी स्थापना करवाएंगे।
वृश्णिका (एनएसयूआई)
– छात्रों की जरूरतों को समझती हूं। छात्रों को अफोर्डेबल एजुकेशन मिल सके, इसका समर्थन करती हूं। केंद्र सरकार जवानों, मजदूरों के लिए क्या कर रही है। ये लोग सिर्फ संघी आइडियोलॉजी को आगे बढ़ाना चाहते हैं। हमारे कैंपस में इंजेक्शन के लिए भी सफदरजंग-एम्स भेजा जाता है। हमारे कैंपस में अस्पताल बनना चाहिए।
अपराजिता (एआईएसएफ)
-फांसीवाद ताकत पूरी दुनिया में और देश में उभर रही है। तमाम जगहों पर दमन, शोषण और अत्याचार बढ़ रहे हैं। मिडल ईस्ट हो, फलस्तीन हो। हमारे पीएम हमेशा फ्लाइट मोड में रहते हैं। आज जो ब्राह्मणवाद-फांसीवाद ताकत सत्ता पर काबिज है, वह झूठ के पुलिंदे पर खड़ी है। आजादी के 70 साल गुजर गए और आज भी जनता रोटी मांगती है।
गीता (आइसा-एसएफआई-एएसएफ)
-हम ऐसा देश चाहते हैं जहां सरकार देश के नागरिकों से डरें। सभी लोग भाई-चारे और प्रेम से रहें। जबकि ये लोग ऐसा देश चाहते हैं कि जहां पर सबको जबर्दस्ती भारत माता की जय के नारे लगाने के लिए कहा जाता है और रोहित वेमुला की मां और नजीब अहमद की मां के संघर्षों का मजाक उड़ाया जाता है। फैलोशिप खत्म करने की भी कोशिश की जा रही है।