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दुर्गम क्षेत्र की 1500 महिलाओं ने लिखी रोजगार की इबारत, जानिए

देहरादून, [नेहा सिंह]: उत्तराखंड के सुदूर बागेश्वर जिले का दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र दिगोली। तकरीबन 200 महिलाएं यहां तल्लीन होकर करघे पर सूत कातने के साथ कपड़े भी बुन रही हैं। पास ही कुछ महिलाएं प्राकृतिक रंग तैयार करने में जुटी हैं। ऐसा ही दृश्य चीन की सीमा से लगे पिथौरागढ़ जिले के सात अवनी केंद्रों पर भी रोजाना साकार होता है। करीब 1500 ग्रामीण महिलाएं इन दो जिलों के दर्जनभर केंद्रों से जुड़ी हैं।

रोजमर्रा के काम निबटाने के बाद वे यहां आकर अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूती देती हैं। इस योगदान के लिए अवनि संगठन को बीते आठ मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के हाथों नारी शक्ति सम्मान से नवाजा गया। उत्साह से लबरेज संगठन की संस्थापक सदस्य रश्मि भारती इस सम्मान को अपने संगठन के लिए एक बड़ी उपलब्धि मानती हैं। कहती हैं, इससे महिलाओं को आगे बढ़ने के लिए प्रेरणा मिलेगी।

 

रश्मि बताती हैं, पहाड़ से लगाव 25 साल पहले मुझे दिल्ली से बेरीनाग (पिथौरागढ़) खींच लाया। यहां की समस्याएं देखीं तो लोगों के लिए कुछ करने की इच्छा जागी। फिर मैंने दिल्ली में मित्र रजनीश जैन से यह विचार साझा किया और 1999 में दोनों ने मिलकर बेरीनाग में अवनी संगठन की नींव रखी। पहले 34 महिलाएं जुड़ीं और आज 1500 महिलाएं संगठन के माध्यम से रोजगार पा रही हैं।

वे बताती हैं कि सभी केंद्रों में ऊन और रेशम की कताई-बुनाई के साथ प्राकृतिक तरीके से रंग बनाने का भी काम होता है। इन केंद्रों के जरिये गांव की महिलाओं को प्रशिक्षण देकर काम दिया जाता है। बागेश्वर में दिगोल, बासती, धर्मगढ़ व थांगा और पिथौरागढ़ में चनकाना, सुकना व त्रिपुरादेवी आदि स्थानों पर अवनि के प्रशिक्षण केंद्र स्थापित हैं।

अवनी संगठन प्राकृतिक तरीके से रंग बनाता है, जिसका उपयोग कपड़ों के साथ दवाओं और कास्मेटिक उत्पादों में भी किया जाता है। संगठन के सदस्य राजेंद्र कुमार जोशी बताते हैं कि रंग बनाने के लिए अखरोट की छाल, अनार के छिलके और बसूंटी (एक प्रकार का खरपतवार) का इस्तेमाल किया जाता है।

हाथों हाथ बिकता है माल

ऊन से बने शॉल और स्टोल के साथ रेशमी कपड़े भी बनाए जाते हैं। इसके लिए धारचूला के सीमावर्ती गांवों और हर्षिल घाटी के भेड़पालकों से ऊन खरीदी जाती है। वहीं उत्तर-पूर्व और बिहार से रेशम का आयात कर कपड़े बनाए जाते हैं। रश्मि बताती हैं कि बुनाई का काम जटिल होने के कारण एक दिन में महज दो से ढाई मीटर कपड़ा ही तैयार हो पाता है। लेकिन गुणवत्ता के कारण इन उत्पादों की काफी डिमांड है। माल हाथों हाथ बिक जाता है।

पहाड़ में पहली बार इंडिगो की खेती

इंडिगो मुख्य रूप से नील की ही प्रजाति है। इसका इस्तेमाल कपड़े रंगने में होता है। संगठन ने बागेश्वर और पिथौरागढ़ की पथरीली जमीन पर इंडिगो की खेती शुरू की। रश्मि बताती हैं कि इसकी खेती में कम पानी लगता है। साथ ही बंदर भी इसे नुकसान नहीं पहुंचाते।

पांच वर्षों में 2.40 करोड़ की आय

अवनी संस्था से जुड़े कुल लाभार्थियों में 76 प्रतिशत महिलाएं हैं। गांवों में महिलाएं कार्य के अनुपात में आय प्राप्त करती हैं। जबकि, बुनकर महिलाएं स्थायी रूप से कार्य करती हैं और महीने में पांच से सात हजार रुपये तक कमा लेती हैं। अन्य कारीगर रंगाई सामग्री के लिए इंडिगो की खेती से आय अर्जित करते हैं। इंडिगो के तीन माह के फसल चक्र के दौरान 10 से 12 दिन के कार्य से महिलाएं तीन से छह हजार रुपये प्रति सीजन कमा रही हैं। बीते पांच वर्षों में ग्रामीण समुदाय की ओर से 2.40 करोड़ की आय अर्जित की गई।

‘अवनी’ संग उम्मीदों के रंग भर रहीं सैकड़ों पहाड़ी महिलाएं

बागेश्वर और पिथौरागढ़ जिले में अवनि संगठन ने 1500 ग्रामीण महिलाओं को रोजगार मुहैया कराया है। ऊनी और रेशमी कपड़े तैयार कर इन महिलाओं ने पिछले पांच साल में करीब ढाई करोड़ रुपये की आय अर्जित की। इस योगदान के लिए अवनि संगठन को राष्ट्रपति के हाथों नारी शक्ति सम्मान से नवाजा जा चुका है।

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