प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रवांडा के दौरे पर हैं. इस अफ्रीकी देश में उनका दो दिन का कार्यक्रम है. इस दौरान वह साल 1994 में वहां एक नरसंहार में मारे गए 2.5 लाख लोगों की याद में बने रवांडा के नरसंहार स्मारक केंद्र पहुंचे. बता दें कि यहां दो समुदायों के बीच हुए इस नरसंहार में 10 लाख से ज्यादा लोगों की हत्या हुई थी. यह नरसंहार 100 दिन तक चला था.

बता दें कि रवांडा में तुत्सी और हुतु दो समुदाय के लोग थे, जिसमें हुतु की जनसंख्या लगभग 85 फीसदी थी. लेकिन, दोनों समुदायों में भीषण संघर्ष की स्थिति बनी रहती थी. देश की राजनीति भी इन्हीं समुदायों के इर्द-गिर्द घुमती थी. साल 1994 के दौर में देश में हुतु समुदाय के लोगों की सरकार थी. इस बीच 6 अप्रैल 1994 में रवांडा के तत्कालीन राष्ट्रपति हेबिअरिमाना और बुरंडियान के राष्ट्रपति सिप्रेन की हवाई जहाज पर बोर्डिंग के दौरान हत्या कर दी गई थी. ऐसे में हुतु समुदाय को लगा कि तुत्सी समुदाय के लोगों ने इस हत्याकांड को अंजाम दिया है.

हुतु सरकार थी शामिल

इस हत्याकांड के दूसरे दिन ही पूरे देश में नरसंहार शुरू हो गया. हुतु सरकार के सैनिक तक इसमें शामिल हो गए. आरोप है कि इसमें रवांडा सेना के अधिकारी, पुलिस विभाग, सरकार समर्थित लोग और उग्रवादी संगठन भी शामिल थे.100 दिन तक लगातार वारदातें होती रहीं, जिससे मौत का आंकड़ा 10 लाख तक पहुंच गया. इसमें तुत्सी समुदाय के लोगों की ही सबसे ज्यादा हत्याएं हुईं.

महिलाओं से रेप का टार्गेट

इसका सबसे ज्यादा शिकार महिलाएं और बच्चे हुए. हजारों महिलाओं के साथ गैंगरेप हुए. आरोप है कि महिलाओं की हत्या से पहले रेप का एक तरह से टार्गेट ही थी. इस जनसंहार में देश की लगभग 20 फीसदी जनसंख्या खत्म हो गई. इसमें तुत्सी समुदाय के लोगों के साथ जरा सी भी सहानुभुती रखने वाले लोगों को भी मौत के घाट उतार दिया गया था.

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हुतु और तुत्सु में क्यों होता था संघर्ष

अफ्रीकी महाद्वीप के देश रवांडा यूरोपियन देश कभी बेल्जियम कॉलोनियल साम्राज्य का हिस्सा हुआ करता था. कॉलोनियल देश की परंपरा बांटो और राज करो की थी और समुदायों को बांटा जाता था. बेल्जियम के लोग तुत्सी समुदाय के लोगों को सपोर्ट करते थे. ऐसे में तुत्सु समुदाय के लोग हुतु पर अत्याचार करने लगे. इसी दौरा में रवांडा आजाद हो गया. बेल्जियम के लोगों के जाने के बाद देश में तुत्सी और हुतु में संघर्ष बढ़ गया और खुद को कमजोर होता देख 3 लाख तुत्सी देश छोड़कर चले गए. इतना ही नहीं साल 1961 में हुतु समुदाय के लोगों ने तुत्सी समुदाय के लोगों को भगाकर रवांडा को जनतंत्र घोषित कर दिया. इसके ठीक बाद साल 1962 में संयुक्त राष्ट्र ने रवांडा को देश मान लिया.

फिर कैसे मजबूत हुए तुत्सी

साल 1962 के बाद से तुत्सी कमजोर हो गए और वहां किसी तरह जीवनयापन करने लगे. साल 1990 में तुत्सी के रिफ्यूजी लोगों ने रवांडन पैट्रियॉटिक फ्रंट बनाकर संघर्ष शुरू किया. उन्होंने धीरे-धीरे खुद को मजबूत किया और रवांडा पर हमला कर दिया. ऐसे में देश पर एक बार फिर संकट के बादल छा गए. इसे देखते हुए रवांडा सरकार और तुत्सियों के फ्रंट ने समझौता कर लिया और तुत्सी रिफ्यूजी नेता भी सरकार में शामिल हो गए. और फिर 6 जुलाई 1994 को घटना हो गई.

फिर क्या हुआ

100 दिनों की नरसंहार के बाद हुतु और तुत्सी में एक बार फिर समझौता हो गया. हुतु समुदाय का नेता राष्ट्रपति और तुत्सी समुदाय का नेता उपराष्ट्रपति बना. देश में नया सविंधान बना और उसकी के अनुसार चुनाव हुए.