Gen-Z विरोध के कारण देना पड़ा था इस्तीफा, अब फिर नेपाल में चुनाव लड़ रहे केपी शर्मा ओली

नेपाल में आज मतदान जारी है। इस बार हिमालयी देश की राजनीति में नया मोड़ देखने को मिल सकता है। काठमांडू और अन्य शहरों में Gen Z वोटर अब पारंपरिक नेतृत्व से पूरी तरह तंग आ चुके हैं। लेकिन ओली अभी भी नेपाल की पुरानी राजनीतिक व्यवस्था के सबसे मजबूत चेहरे बने हुए हैं।
इस चुनाव में सबसे ज्यादा चर्चा वाला मुकाबला झापा-5 सीट पर है, जहां ओली के गढ़ में ही बालेन ने सीधा चैलेंज दे दिया है। ओली 2024 में गठबंधन सरकार में फिर प्रधानमंत्री बने। लेकिन पिछले साल सितंबर में Gen Z के बड़े विरोध प्रदर्शनों के दौरान वे सत्ता में थे। इन प्रदर्शनों में भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और सोशल मीडिया बैन जैसे मुद्दों पर युवा सड़कों पर उतरे। पुलिस की कार्रवाई में कई मौतें हुईं।
कई लोगों को लगा कि विरोध के बाद इस्तीफा ओली के राजनीतिक करियर का अंत होगा। लेकिन वे फिर से झापा-5 से चुनाव लड़ रहे हैं।
कैसा रहा है ओली का राजनीतिक अतीत?
KP शर्मा ओली का जन्म 1952 में हुआ था। वे पंचायत काल में बड़े हुए, जब राजनीतिक पार्टियां पूरी तरह प्रतिबंधित थीं। 1970 में किशोरावस्था में ही वे कम्युनिस्ट एक्टिविस्ट बन गए और राजतंत्र के खिलाफ पार्टीविहीन व्यवस्था का विरोध करने लगे।
अक्टूबर 1973 में झापा विद्रोह और राजतंत्र-विरोधी गतिविधियों में शामिल होने के कारण उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। वे 14 साल जेल में रहे, जिनमें से 4 साल एकांत कारावास में भी रहे। दशकों बाद वही पूर्व विद्रोही नेपाल की राजनीति में सबसे ताकतवर शख्सियत बन गए।
एक राजनीतिक विश्लेषक ने 2018 में एक नेपाली अखबार को बताया था कि पंचायत काल की जेल से निकले नेताओं की राजनीति पर सख्त नजरिया होता है। वे मानते हैं कि सत्ता को मजबूती से इस्तेमाल करना चाहिए, क्योंकि उन्होंने देखा है कि इसे कितनी आसानी से कुचला जा सकता है।
व्यंग्य से विरोधियों को चित्त कर देते हैं ओली
1990 के जनआंदोलन के बाद बहुदलीय लोकतंत्र बहाल होने पर ओली ने खुले तौर पर राजनीति शुरू की। वे कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूनिफाइड मार्क्सिस्ट-लेनिनिस्ट) से जुड़े और संसद में पहुंचे। वहां उनकी छवि सीधी-सपाट बातचीत, कटाक्ष और व्यंग्य वाली बनी। तब से वे नेपाल की अस्थिर गठबंधन राजनीति में प्रमुख खिलाड़ी बने रहे।
2015 का राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में पैरा जमाया
ओली का राष्ट्रीय स्तर पर बड़ा ब्रेक 2015 में आया, जब नेपाल ने नया संविधान अपनाया और भारत के साथ संबंध बहुत खराब हो गए। दक्षिणी सीमा पर विरोध प्रदर्शनों से ईंधन, दवाइयां और जरूरी सामान की सप्लाई महीनों तक रुकी रही। नेपाल में इसे भारत का अनौपचारिक नाकाबंदी माना गया।
ओली ने इस संकट को संप्रभुता और राष्ट्रीय गरिमा का सवाल बनाया। तब ओली का संदेश जनता को बहुत भाया। राष्ट्रवादी लहर के चलते 2017 के चुनाव में वाम गठबंधन को भारी बहुमत मिला और ओली मजबूत सरकार के साथ प्रधानमंत्री बने।
लेकिन फिर अपनी ही पार्टी में असंतोष के कारण दिसंबर 2020 में ओली ने संसद भंग कर दी। लेकिन तब सुप्रीम कोर्ट ने इसे बहाल कर दिया। फिर मई 2021 में फिर संसद भंग की कोशिश हुई, जिससे संवैधानिक संकट पैदा हुआ और उन्हें पद छोड़ना पड़ा।





