Gen-Z को खोखला कर रही ‘परफेक्शन’ की दौड़

एक दशक में दुनिया ने एक तेज सांस्कृतिक विस्तार देखा है, जिसे कोरियाई वेव कहा जाता है। दक्षिण पूर्व एशिया के एक छोटे से देश, दक्षिण कोरिया ने अपने संगीत (के -पॉप), नाटकों (के-ड्रामा), खानपान (के-फूड) और अब मोबाइल गेम्स के जरिए पूरी दुनिया के लोगों, खासकर किशोरों और युवाओं के बीच गहरी लोकप्रियता हासिल की है, लेकिन इस चमचमाती दुनिया का एक स्याह पक्ष भी है, जहां यह दीवानगी कभी-कभी आत्मघाती जुनून में बदल जाती है। इसी का ताजा उदाहरण है, जहां गाजियाबाद में एक ही परिवार की तीन बच्चियों ने बालकनी से कूदकर जान दे दी।

इन तीनों ने कथित तौर पर के-पाप और कोरियाई संस्कृति के प्रति गहरे लगाव और उससे उपजे मानसिक तनाव के कारण आत्महत्या कर ली। यह घटना सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम अपनी युवा पीढ़ी को ऐसी ‘परफेक्ट दुनिया’ की ओर धकेल रहे हैं, जहां से रास्ता केवल विनाश की ओर जाता है।

संगीत ने बदली परिभाषा
कोरियाई संगीत अपने हुक स्टेप्स, उच्च स्तर की कोरियोग्राफी और विजुअल एस्थेटिक्स का मिश्रण होता है। जिसे हम के-पाप कहते हैं, वह केवल संगीत नहीं है। के-पाप दक्षिण कोरिया की सुनियोजित सांस्कृतिक नीति का हिस्सा है, जिसे साफ्ट पावर के रूप में इस्तेमाल किया गया है। 21वीं शताब्दी की शुरुआत से ही के-पाप का विस्तार होने लगा था। पश्चिमी देशों सहित भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में हाल्यू के नाम से प्रसिद्ध यह नई संस्कृति 2005-06 के आस-पास अपने पैर पसार चुकी थी, लेकिन भारत के मेनलैंड की यात्रा पूरी करने में इसे लगभग चार-पांच साल और लग गए।

उसके बाद दक्षिण कोरियाई गायक साई के गाने गंगनम स्टाइल, बीटीएस, ब्लैकपिंक जैसे बैंड्स ने किशोरों के बीच संगीत की परिभाषा ही बदल दी। किशोरों के लिए ये केवल गायक नहीं,‘आइडल्स’ होते हैं। कुछ मामलों में लगाव इतना गहरा हो जाता है कि किशोर भावनात्मक रूप से असंतुलित हो जाते हैं। वहीं के-ड्रामा की बात करें तो यह भावनाओं का एक नया व्याकरण है। ‘क्रैश लैंडिंग आन यू’ से लेकर ‘स्क्विड गेम’ तक, भावनात्मक कहानी कहने की एक नई शैली लोकप्रिय हुई है, जिसकी उच्च तकनीकी गुणवत्ता और सौम्य प्रस्तुति युवाओं को आकर्षित करती है।

जेन जी में जुनून
आखिर कोरियाई वेव का सबसे अधिक प्रभाव किशोरों पर ही क्यों पड़ रहा है? असल में किशोरावस्था पहचान, स्वीकार्यता और भावनात्मक सहारे की तलाश की उम्र होती है। कोरियाई एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री इन्हीं जरूरतों को बेहद आकर्षक और सुनियोजित ढंग से संबोधित करती है। इसके अलावा, के-पाप अपने आइडल्स को ‘परफेक्ट’ दिखाता है। ये आइडल्स सुंदरता के तय मानकों पर सर्वोपरि, सभ्य और प्रतिभाशाली होते हैं। वहीं, के-पाप गानों के बोल अक्सर मानसिक स्वास्थ्य, अकेलेपन और सेल्फ-लव पर केंद्रित होते हैं। डिजिटल लत भी एक मुख्य कारण है। मोबाइल गेम्स और ई-स्पोर्ट्स संस्कृति ने स्क्रीन टाइम को बेहिसाब बढ़ा दिया है। इन खेलों, शोज और गानों को इस तरह तैयार किया जाता है कि यूजर्स को लत लगने का खतरा बढ़ जाता है।

जुनूनी प्रशंसक बनते घातक
जब जुनून जानलेवा बन जाए तो इससे घातक कुछ नहीं होता। कोरियाई संस्कृति के प्रति यह गहरा आकर्षण कभी-कभी ‘पैरासोशल रिलेशनशिप’ का रूप ले लेता है। इसमें फैंस को लगता है कि उसका अपने आइडल के साथ वास्तविक रिश्ता है। जब यह रिश्ता जुनून बन जाता है, तो इसके परिणाम गंभीर होते हैं। इनमें से ही एक है सासेंग फैंस का आतंक, यानी वे प्रशंसक जो अपने आइडल्स की जासूसी करते हैं और उनके निजी जीवन को नष्ट कर देते हैं। मनोवैज्ञानिक इसे गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्या से जुड़ा व्यवहार मानते हैं।

कुछ मामलों में इस तरह की भावनात्मक निर्भरता ने आत्मघाती विचारों को भी जन्म दिया है। विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसी घटनाओं के पीछे कई जटिल कारण होते हैं। कुछ मामलों में भावनात्मक निर्भरता इतनी बढ़ जाती है कि आइडल्स की छोटी सी परेशानी या उनकी मृत्यु (जैसे 2017 में स्टार जोंगह्युन की आत्महत्या) प्रशंसकों में आत्मघाती विचारों को जन्म देती है। इन दुष्परिणामों से भारत भी अछूता नहीं है और यहां के किशोरों में भी इससे जुड़े संकट की गंभीरता बढ़ती जा रही है। गाजियाबाद की घटना इसी खतरनाक प्रवृत्ति का चरम उदाहरण है।

दुनिया है या मायाजाल
खरीदारी के लिए सुपरमार्केट या माल जाएं तो कोरियाई फैशन से लेकर ग्लास स्किन देने का वादा करने वाले मेकअप उत्पाद और मिनिसो स्टोर पर मौजूद हर आयुवर्ग को आकर्षित करने वाले प्लशीज और खिलौने सहित तमाम प्रोडक्ट की भरमार है। कोरियाई खानपान भी काफी समय पहले से ही अपनी जगह बना चुका है। राम्यन, किमची और बिबिमबाप अब हाउसहोल्ड फूड हैं। वहीं, दक्षिण कोरिया के मोबाइल गेम्स और ई-स्पोर्ट्स संस्कृति ने किशोरों के स्क्रीनटाइम को बेहिसाब बढ़ाया है।

इन खेलों का डिजाइन ऐसा होता है कि वे यूजर्स को लंबे समय तक जोड़े रखते हैं, जिससे लत लगने का खतरा बढ़ जाता है। अंगूठा और अंगुली की मदद से बनने वाला दिल का इशारा कोरियाई संस्कृति से होता हुआ वाट्सएप इमोजी तक बनकर अपनी प्रसिद्धि पर मुहर लगा चुका है। सामान्य लोगों से लेकर कई सेलेब्रिटी तक इसी तरह का इशारा करके पैपराजी और सेल्फी देते नजर आ जाते हैं।

जरूरी है हस्तक्षेप
कोरियाई वेव कला और साफ्ट पावर का एक बेहतरीन उदाहरण है, लेकिन इसका अंधाधुंध पालन घातक है। गाजियाबाद में हुई घटना ‘वेक-अप काल’ हैं। अभिभावकों और शिक्षकों को यह समझने की जरूरत है कि यदि निगरानी न हो, तो यह आकर्षण एक विनाशकारी डिजिटल निर्भरता में बदल सकता है। अमेरिकी मनोवैज्ञानिक एसोसिएशन जैसी संस्थाओं का कहना है कि किशोरों के मीडिया उपभोग पर नजर रखना और उन्हें वास्तविकता और कल्पना के बीच का अंतर समझाना बेहद जरूरी है। किसी भी नई और दूसरी संस्कृति से जुड़ना इंसान को समृद्ध करता है, पर उसमें अपनी पहचान को विलीन कर देना, खासकर किशोरावस्था में, एक चुपचाप पनपता खतरा है। ‘सेल्फ-लव’ का मतलब किसी आइडल जैसा बनना नहीं, बल्कि अपनी विशिष्टता को स्वीकार करना है।

यह कैसी प्रतिस्पर्धा?
दरअसल, कोरियाई लहर के पीछे कुछ ऐसे ‘मानक’ हैं जो किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए घातक साबित हो रहे हैं। उनमें से पहला है टफ ब्यूटी स्टैंडर्ड। कोरियाई संस्कृति में गोरा और बहुत पतला होना लगभग अनिवार्य माना जाता है। इसे देखकर किशोर ‘बाडी डिस्मोर्फिया’ (अपनी शारीरिक बनावट को लेकर अत्यधिक चिंता) के शिकार हो जाते हैं।

दूसरा है, प्रतिस्पर्धा और दबाव। दरअसल कोरियाई समाज में हर स्तर पर गला काट प्रतिस्पर्धी है। कोरियाई ड्रामों में अक्सर व्यक्ति के सर्वश्रेष्ठ और परफेक्ट होने को केंद्र में रखा जाता है। अगर आप परफेक्ट नहीं हैं, तो आप मूल्यहीन हैं। इससे किशोरों में ‘असफलता का डर’ भर जाता है।

तीसरा है, डिजिटल सेपरेशन यानी अलगाव। घंटों मोबाइल गेम और ड्रामा देखने से वास्तविक दुनिया से उनका संपर्क कट जाता है। ऐसे में वे इंटरनेट की ‘परफेक्ट’ दुनिया और अपनी ‘अधूरी’ असल जिंदगी के बीच तुलना करते हैं और इससे अवसाद का जन्म होता है।

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