जमीन में धंसा है मंदिर का गुंबद, क्यों कहलाया ‘उल्टा मंदिर’, जानिए

रटलाई/झालावाड़.ये उल्टा मंदिर है। 13वीं शताब्दी का यह मंदिर प्राचीन स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है। इतिहासविदों का कहना है कि इस मंदिर का गुंबद जमीन में धंसा है, पटाव या फर्श ऊपर की ओर है। खंभों पर लगी चौकियां भी ऊपर की ओर हैं। इसलिए इसे उल्टा मंदिर नाम दे दिया गया। मंदिर की कोई नींव नहीं है। मंदिर की दीवारें छत 3-3 फीट लंबी, डेढ़ फीट चौड़ी आधे फीट मोटी शिलाओं से बनी है।जमीन में धंसा है मंदिर का गुंबद, क्यों कहलाया 'उल्टा मंदिर', जानिए

– 18 खंभों पर टिके इस मंदिर के निर्माण में रेत-चूना-गारा आदि का इस्तेमाल नहीं हुआ है। ये सिर्फ शिलाओं से बना है और उसी पर टिका है।

– मंदिर में बावन भैरू, चौसठ जोगनिया, काली-कंकाली, हनुमान, शिवजी की मूर्तियां हैं। लेकिन, जर्जर हो चुके इस मंदिर में पुजारी है यहां लोग सामान्य दिनों में पूजा करने आते हैं।

किंवदंती भी है इस मंदिर को लेकर: कहाजाता है कि दो तांत्रिकों ने अपनी तंत्र साधना से आसमान में उड़ते जा रहे इस मंदिर को यहां उतारा, लेकिन यह उल्टा गिरा।

उपेक्षा का शिकार: सरकारऔर प्रशासन की अनदेखी के कारण यह प्राचीन मंदिर उपेक्षा का शिकार हो रहा है। यहां मवेशी विचरण करते हैं। प्रशासन ने आज तक इसका फोटो डाक्यूमेंटेशन नहीं कराया। पर्यटन की सूची में भी शामिल नहीं है।

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होना क्या चाहिए: स्थापत्य कला के इस अनूठे मंदिर का जीर्णोद्धार होना चाहिए। सरकार को इसे पर्यटन स्थलों की सूची में शामिल करना चाहिए।

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