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नागरिकता की पुष्टि करने में तीन साल लग गए विदेश विभाग को

मुंबई, ओमप्रकाश तिवारी। हमारी सरकार मोसूल की पहाडिय़ां खुदवाकर 39 भारतीयों के शव लाने में सक्षम है। लेकिन किसी व्यक्ति के अपने देश का नागरिक होने की पुष्टि करने में तीन साल लग जाते हैं। जिसके कारण पाकिस्तानी जेल से रिहा हो चुका मध्यप्रदेश का 20 वर्षीय जीतेंद्र अर्जनवार आज भी वहां की जेल में सडऩे को मजबूर है। 

मध्यप्रदेश के सिवनी जनपद के बरघाट गांव का निवासी जीतेंद्र 12 अगस्त, 2013 को घर से झगड़कर राजस्थान की ओर निकल गया। वहां अजमेर से सीमा पारकर पाकिस्तान जा पहुंचा। पाकिस्तानी रेंजर्स ने उसे पकड़कर सिंध की हैदराबाद सेंट्रल जेल में बंद कर दिया। करीब साल भर बाद जून 2014 में उसकी सजा पूरी हो गई। लेकिन उसकी रिहाई तब तक संभव नहीं थी, जब तक कि भारत उसे अपने नागरिक रूप में स्वीकार न कर ले। कुछ सरकारी उदासीनता केकारण आज तक इस स्वीकार्यता की प्रक्रिया पूरी नहीं पाई, जिसके कारण जीतेंद्र को बीमारी की हालत में पाकिस्तानी जेल में रहना पड़ रहा है। पाकिस्तान इंडिया पीपुल्स फोरम फॉर पीस एंड डेमोक्रेसी (पीआईपीएफपीडी) के महासचिव जतिन देसाई बताते हैं कि 2008 में दोनों देशों केबीच हुए समझौते के अनुसार गलती से सीमा पार कर गए किसी नागरिक को तीन माह के अंदर काउंसिलर एक्सेस दिए जाने का प्रावधान है। जिसके तहत उस देश के राजदूतावास के अधिकारी जेल में जाकर अपने नागरिक से मिलते हैं। उसकी फोटो खींचते हैं। उसके गांव-जिले की जानकारी लेते हैं। इन जानकारियों की पुष्टि हो जाने के बाद संबंधित व्यक्ति की रिहाई हो जाती है। 

देसाई के अनुसार जीतेंद्र को काउंसिलर एक्सेस मिलने में देर हुई। उसे उसकी सजा पूरी होने के बाद जनवरी 2015 में काउंसिलर एक्सेस मिला। भारतीय राजदूतावास के अधिकारी उससे मिलने गए और सारी जानकारियां लेकर भारत के विदेश विभाग को भेज भी दीं। लेकिन तब से विदेश विभाग में यह फाइल जाने कहां अटकी रही कि पुष्टि के लिए मध्यप्रदेश नहीं भेजी जा सकी। कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं की लिखापढ़ी के बाद पिछले सप्ताह विदेश विभाग की तरफ से जीतेंद्र से संबंधित जानकारियों की पुष्टि के लिए पत्र सिवनी के पुलिस अधीक्षक तरुण नायर को प्राप्त हुआ । नायर ने दो दिन के अंदर ही जीतेंद्र के उसी जनपद का नागरिक होने की पुष्टि कर दी है। अब जीतेंद्र की रिहाई की उम्मीद बंधी है। देसाई कहते हैं कि विदेश विभाग सजग रहता तो यह कार्यवाही तीन साल पहले पूरी हो जाती, तो इन दिनों गंभीर बीमारी से जूझ रहे जीतेंद्र को इतने दिन पाकिस्तानी जेल में न गुजारने पड़ते।   

 
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