CAG ने पकड़ी गड़बड़ी, इस वजह से देर से चल रही हैं ट्रेनें

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भारतीय रेल के तमाम दावों के बावजूद ट्रेनों की लेट-लतीफी कम नहीं हो रही है. पैसेंजर या मेल-एक्सप्रेस ट्रेनों की कौन कहे, राजधानी और शताब्दी एक्सप्रेस जैसी प्रीमियम ट्रेनें भी देरी से चल रही हैं. जुलाई में राज्यसभा में एक प्रश्न का लिखित जवाब देते हुए रेल राज्यमंत्री ने बताया था कि पिछले दो महीने से ज्यादा समय से 20 प्रतिशत से ज्यादा राजधानी और शताब्दी एक्सप्रेस रेलगाड़ियां देरी से चल रही हैं. वहीं, इसी साल मई में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2017-18 में 30 फीसदी से ज्यादा ट्रेनें देरी से चलीं. आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार अप्रैल 2017 से मार्च 2018 के बीच भारतीय रेलवे की 71.39 प्रतिशत ट्रेनें ही समय पर चलीं. यह पिछले तीन वर्षों में ट्रेनों के समय पालन का सबसे खराब प्रदर्शन का रिकॉर्ड है. रेलवे से अगर आप ये सवाल पूछेंगे तो रटा-रटाया एक ही जवाब होगा, यात्रियों की सुरक्षा और संरक्षा को देखते हुए पटरियों को सुधारने के कार्यों की वजह से ट्रेनों के समय पालन में देरी हो रही है. रेल मंत्री से लेकर रेलवे के तमाम जोनों के अधिकारियों का यही जवाब होता है. लेकिन भारत के नियंत्रक एवं महालेखाकार यानी CAG ने ट्रेनों की इस लेट-लतीफी का कारण ढूंढ़ लिया है. बीते मंगलवार को लोकसभा के पटल पर रखी गई CAG की ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि स्टेशनों पर ट्रेनों के लिए जगह की कमी के कारण ही ट्रेनें देरी से चल रही हैं.

स्टेशनों के विकास की योजनाओं ने किया ‘बेपटरी’

ट्रेनों के देरी से चलने के कारण एक तरफ जहां यात्री परेशान होते हैं, वहीं रेलवे पूछताछ में इसका संतोषजनक जवाब नहीं मिलने पर उन्हें झल्लाहट भी होती है. अंग्रेजी अखबार इकोनॉमिक टाइम्स में छपी खबर के अनुसार, लोकसभा में पेश की गई रिपोर्ट में CAG ने ट्रेनों के संचालन के ‘बेपटरी’ होने के कारणों का खुलासा किया है. CAG ने अपनी रिपोर्ट में कहा है, ‘यात्री सुविधा बढ़ाने के नाम पर स्टेशन के विकास या पुनर्विकास की योजनाएं तो लाई गईं, लेकिन यह सिर्फ दिखाने भर की हैं, क्योंकि इससे ट्रेनों के संचालन में कोई सुधार नहीं हुआ.यात्रियों के लिए सबसे जरूरी है कि ट्रेनें समय पर चलें, ट्रेनें समय पर स्टेशन आएं और रवाना हो जाएं, ऐसा नहीं हुआ.’ CAG ने रिपोर्ट में कहा है कि देश के विभिन्न स्टेशनों पर ट्रेनों को ठहराने के लिए न तो पर्याप्त प्लेटफॉर्म हैं और न लाइनें हैं. कई स्टेशनों पर तो 24 कोच वाली ट्रेनों के रुकने के लिए प्लेटफॉर्म भी नहीं है. इन कारणों से ही ट्रेनों को समय पर चलाना संभव नहीं हो पा रहा है. इसके अलावा वाशिंग-पिट लाइन और वैकल्पिक लाइनों की कमी भी ट्रेनों को समय पर चलाने में बड़ी बाधा है.

10 जोन के 15 स्टेशनों का किया सर्वे

CAG ने अपने ऑडिट के लिए भारतीय रेलवे के 10 जोनों के हेवी ट्रैफिक वाले 15 प्रमुख स्टेशनों का सर्वे किया. इनमें पश्चिम बंगाल, मध्य रेलवे, पश्चिम रेलवे और पूर्व रेलवे जोन के कई स्टेशन शामिल हैं. इस ऑडिट रिपोर्ट के आंकड़ों के आधार पर CAG ने ट्रेनों के देरी से चलने के कारणों का विश्लेषण किया है. इकोनॉमिक टाइम्स की खबर के अनुसार CAG ने एक महीने (मार्च 2017) में जुटाए गए आंकड़ों के आधार पर कहा है कि कई स्टेशनों पर ट्रेनों के संचालन के लिए बुनियादी सुविधाओं का अभाव है. CAG ने कहा है कि कुल 164 प्लेटफॉर्मों में सिर्फ 100 प्लेटफॉर्म ही ऐसे थे, जिन पर 24 या इससे अधिक कोच वाली ट्रेनों को ठहराए जाने की व्यवस्था थी. इस कारण रेलवे को कई स्टेशनों के छोटे प्लेटफॉर्मों पर ही लंबी दूरी तक चलने वाली 24 कोच वाली ट्रेनों को ठहराना पड़ता है. स्टेशनों पर छोटे या कम प्लेटफॉर्मों के कारण ट्रेनों को आउटर सिग्नल या पिछले स्टेशनों पर रोकना पड़ता है, जिसके कारण उनके संचालन में अनावश्यक रूप से देरी होती है. हावड़ा, भोपाल, इटारसी और अहमदाबाद जैसे स्टेशनों पर पैसेंजर ट्रेनों को 15 मिनट या इससे अधिक देर तक रोकना पड़ता है. इन स्टेशनों पर आने के बाद भी ट्रेनों को 15 से लेकर 25 मिनट तक रोका जाता है.

वाशिंग-पिट और स्टेब्लिंग लाइन का अभाव

कई बार जब आप ट्रेनों के निर्धारित समय से पहले स्टेशन पहुंचे होंगे तो आपके सुनने में आया होगा कि फलां ट्रेन समय पर तो आ गई, लेकिन अभी तक उसकी साफ-सफाई नहीं हो पाई है. मेंटेनेंस के बाद ही ट्रेन प्लेटफॉर्म पर लगाई जाएगी. CAG ने इस मुद्दे को भी ट्रेनों की लेट-लतीफी के लिए बड़ा कारण बताया है. ट्रेनों के देरी से परिचालन के महत्वपूर्ण कारकों में CAG ने बड़े स्टेशनों पर वाशिंग-पिट और स्टेब्लिंग लाइनों का अभाव भी बताया है. CAG ने कहा है कि कई स्टेशनों पर 24 या इससे ज्यादा कोच वाली ट्रेनों के मेंटेनेंस के लिए पर्याप्त सुविधायुक्त वाशिंग-पिट नहीं हैं, जिसके कारण भी ट्रेनों को समय पर चलाने में देरी होती है. इसके अलावा CAG ने स्टेब्लिंग लाइनों की कमी की ओर भी ध्यान दिलाया है. स्टेब्लिंग लाइनें वह होती हैं, जिन पर वाशिंग-पिट पर भेजे जाने से पहले ट्रेनों को रखा जाता है. यानी CAG के अनुसार, ट्रेनों की बारी-बारी से सफाई करने के लिए जिस तादाद में पटरियों की जरूरत है, ताकि ट्रेनें कतार में खड़ी रह सकें, इसका भी कई स्टेशनों पर अभाव है. इस कारण ट्रेनों की साफ-सफाई में बेवजह की देरी होती है, जिसका असर इनके परिचलान पर पड़ता है. CAG के अनुसार, जिन 15 स्टेशनों का ऑडिट किया गया, वहां कुल 79 वाशिंग-पिट लाइन और 63 स्टेब्लिंग लाइनें हैं. इनमें से सिर्फ 35 वाशिंग-पिट और 20 स्टेब्लिंग लाइनें ही ऐसी हैं, जिन पर 24 कोच या इससे ज्यादा लंबी ट्रेनों की साफ-सफाई मुमकिन है.

ट्रेन टाइम पर चलाने को CAG की सलाह

1- ट्रेनें समय पर चलें, इसके लिए रेलवे को हेवी ट्रैफिक वाले स्टेशनों के संबंध में मास्टर प्लान बनाना होगा.
2- इन स्टेशनों पर कितनी लाइनों की जरूरत है, इसका अध्ययन करना होगा.
3- प्रमुख स्टेशनों पर प्लेटफॉर्मों, वाशिंग-पिट लाइन और स्टेब्लिंग लाइन की संख्या बढ़ाई जाए.
4- स्टेशनों के विकास के साथ-साथ ट्रेन संचालन के लिए बुनियादी सुविधाओं पर ज्यादा जोर देने की जरूरत.
5- ट्रेनें समय पर चलें, इसके लिए यार्डों का विकास जरूरी, यार्ड का आधुनिकीकरण किया जाए.

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