‘सिंध’ शब्द पर पहले भी उठाए गए हैं सवाल

यह पहला मौका नहीं है कि जब राष्ट्रगान में ‘सिंध’ शब्द को लेकर सवाल उठाया गया है. इससे पहले वर्ष 2011 में मुंबई के सेवानिवृत्त प्रोफेसर श्रीकांत मलुश्ते ने बांबे हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी. प्रो. मलुश्ते ने भी राष्ट्रगान में ‘सिंध’ शब्द के उपयोग को चुनौती दी थी. लेकिन उस समय सरकार ने हाईकोर्ट में हलफनामा दायर कर इसे सही करार दिया था. केंद्रीय गृह मंत्रालय ने हाईकोर्ट में दिए गए अपने हलफनामे में कहा था कि राष्ट्रगान में ‘सिंध’ और ‘सिंधु’, दोनों शब्द सही हैं. मंत्रालय का कहना था कि गाने और बोलने के लिए दोनों शब्दों ‘सिंधु’ और गीत के लिखित संस्करण में ‘सिंध’ शब्द का अर्थ एक ही है. इसका अर्थ नदी या सिंधी समुदाय, दोनों के रूप में लगाया जा सकता है. हलफनामे में कहा गया है कि दोनों शब्द ‘सिंध’ और ‘सिंधु’ नदी या सिंधी समुदाय का जिक्र करते हैं. राष्ट्रगान कोई वृत्तांत नहीं है, जो देश के इलाकों को परिभाषित करता है. जब इसे लिखा गया था उस समय भारत का हिस्सा रहे राज्यों या क्षेत्रीय इलाकों की यह सूची भी नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट ने ‘सिंध’ की जगह ‘कश्मीर’ शब्द पर किया था ऐतराज

वर्ष 2005 में भी राष्ट्रगान में इस्तेमाल किए गए ‘सिंध’ शब्द को ‘कश्मीर’ शब्द से बदलने को लेकर कोर्ट में याचिका दायर की गई थी. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया था. वर्ष 2011 में बांबे हाईकोर्ट में दिए गए हलफनामे में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने ‘कश्मीर’ शब्द को नहीं जोड़ने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी हवाला दिया था. साथ ही यह भी दावा किया था कि यह आवश्यक नहीं है कि जब-जब देश में क्षेत्रीय परिवर्तन हो तो हर बार राष्ट्रगान में संशोधन किया जाए. सरकार ने कहा था कि ‘सिंध’ शब्द हटाना मंत्रालय द्वारा जारी आदेश का उल्लंघन होगा. इससे सुप्रीम कोर्ट के आदेश की भी अवमानना होगी. बांबे हाईकोर्ट में दायर याचिका में भी कांग्रेस सांसद रिपुन बोरा के जैसा ही तर्क दिया गया था. कहा गया था कि वर्ष 1917 में जब राष्ट्रगान की रचना हुई थी, उस समय सिंध भारत का हिस्सा था, अब नहीं है.