नोटबंदी-जीएसटी से व्यापारियों के गुस्से से होगा कांग्रेस को फायदा?

गुजरात में बीते दशक में कांग्रेस के सत्ता से बाहर होने के पीछे एक बड़ी वजह यह है कि पार्टी शहरी सीटों को जीतने में नाकाम रही है. 2012 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने अहमदाबाद के 17 सीटों में से 15 सीटें जीतीं, सूरत में 16 में से 15 सीटें जीतीं. वडोदरा के सभी पांच सीटों पर कब्जा जमाया और राजकोट सिटी के चार में से तीन सीटों पर जीत हासिल की.

लेकिन नोटबंदी और जीएसटी आगामी विधानसभा चुनाव में शहरी सीटों पर बीजेपी की परफॉर्मेंस निराश कर सकती है. पिछले चुनाव के नतीजे बताते हैं कि शहरी क्षेत्र के बिजनेस और ट्रेडिंग कम्युनिटी बीजेपी के तरफ थे. चाहे वो सूरत की डायमंड इंडस्ट्री हो, अहमदाबाद की टेक्सटाइल इंडस्ट्री हो या गुजरात के अन्य शहरों की कोई और इंडस्ट्री हो, बीजेपी ने सभी शहरी सीटों पर जबरदस्त बहुमत हासिल किया था. हालांकि इस बार आंकड़ों मे बदलाव आ सकता है.

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नोटबंदी और जीएसटी के बाद बिजनेस कम्युनिटी में उपजे गुस्से और हताशा को भांपकर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने नवसर्जन यात्रा के पहले चरण के दौरान सौराष्ट्र के जामनगर में ट्रेडर्स और छोटे व्यापारियों से मुलाकात की. इस दौरान राहुल ने कहा कि एनडीए सरकार ने नोटबंदी और जीएसटी जैसी बड़ी गलतियां की है. राहुल ने कहा कि जीएसटी पर हमने सरकार से धीरे-धीरे आगे कदम बढ़ाने को कहा था लेकिन उन्होंने इसे जल्दबाजी में लागू कर दिया. यही वजह है कि छोटे व्यवसाय काफी प्रभावित हुए हैं.

कांग्रेस के मुताबिक, पीने के पानी की समस्या, किसानों की समस्या और बेरोजगारी ग्रामीण इलाकों में चुनाव के दौरान अहम मुद्दे होंगे. शहरी इलाकों में सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा चर्चित ‘विकास पागल हो गया’ लोगों को प्रभावित करेगा.

जेम्स एंड ज्वेलरी एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के रिदनल चेयरमैन दिनेश नानावती ने कहा कि इसमें कोई दो राय नहीं कि वोट के मामले में बीजेपी को डायमंड इंडस्ट्री से झटका लगने वाला है. इंडस्ट्री में लोगों के बीच गुस्सा और हताशा नोटबंदी से ज्यादा जीएसटी जिस तरीके से लागू किया गया, उसे लेकर है. यह गुस्सा इंडस्ट्री के लोगों द्वारा वोटिंग के दौरान देखने को मिलेगा. 

साउथ गुजरात टेक्सटाइल प्रोसर्स एसोसिएशन के प्रेसिडेंट जीतू वखारिया कहते हैं कि बीजेपी के लिए सिर्फ डायमंड इंडस्ट्री ही सिरदर्द नहीं है, बल्कि टेक्सटाइल इंडस्ट्री में भी गुस्सा और नाराजगी है. बुनकरों से लेकर प्रोसेसर्स और ट्रेडर्स तक नोटबंदी और जीएसटी से प्रभावित हुए हैं.  इंडस्ट्री के लोग शायद कांग्रेस के लिए वोट न करें लेकिन वे बीजेपी को भी वोट नहीं करने जा रहे.

राजनीतिक विश्लेषक विष्णु पंड्या कहते हैं कि जीएसटी और नोटबंदी इस चुनाव में कोई फैक्टर होगा, इस बात से सभी सहमत नहीं हैं. नोटबंदी को लगभग एक साल हो चुके हैं और स्पष्ट रूप से कहें तो जीएसटी आने के बाद आम आदमी के फैमिली बजट में कुछ ज्यादा बदलाव नहीं हुआ है. 

सोशल साइंटिस्ट हेमंत कुमार शाह का कहना है कि बिजनेस और ट्रेडिंग कम्युनिटी में नोटबंदी से ज्यादा जीएसटी भारी असंतोष पैदा कर रहा है. न सिर्फ बड़े शहरों में बल्कि छोटे शहरों में भी जीएसटी का असर देखने को मिल रहा है. मैंने लोगों के इस गुस्से को देखा है जो विधानसभा चुनाव में लोगों के वोट करने के दौरान देखने को मिलेगा.

हालांकि बीजेपी को उम्मीद है कि विकास का मुद्दा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जनसभाएं शहरी वोट शेयर को हासिल करने में मदद करेगा.

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