एशिया के सबसे पुराने रेड लाइट एरिया कमाठीपुरा का कुछ इस तरह है हाल…

दुनिया ने तजुर्बात-ओ-हवादिस की शक्ल में, जो कुछ मुझे दिया है, लौटा रहा हूँ मैं. जी हां.. मुंबई का कमाठीपुरा कुछ ऐसे ही ज़माने को लौटा रहा है, अपने अंदर समेटे हुए कड़वे जज़्बात और तजुर्बों को. मुंबई की चकाचौंध के बीच मौजूद कमाठीपुरा, इंसानियत और समाज दोनों के चेहरों पर ही एक झन्नाटेदार तमाचा है. एशिया के सबसे पुराने रेड लाइट एरिया कमाठीपुरा की सहमी गलियों में सिसक रही हैं, ना जाने कितनी ही मज़लूम औरतों की मजबूरियां.
मजबूरियों पर अय्याशियों की महफ़िलें
युवती से सिनेमा हॉल में ले जाकर किया गैंगरेप
कहते हैं जब मजबूरियां हद से गुज़र जाएं, तो कुछ इस सूरत में जश्न की शक्ल ले लेती हैं. एक बाग़ी जश्न. क्योंकि मजबूरियों की क़ब्र पर सजी हैं. अय्याशियों की ये महफ़िलें. उस माहौल की खनक में छुपे दर्द को समझने के लिये ज़रूरी नहीं है कि आप एक शायर हों या एक फ़िलॉसफ़र. इसे समझने के लिये आपका बस एक इंसान होना ही काफ़ी है. किसे नहीं मालूम कि उनकी सूरतों ने सजने से पहले अपनी सीरत को कुचला है. उनके जिस्मों ने दमकने से पहले अपनी रूह का दमन किया है. उनके तन ने मचलने से पहले अपने मन को रौंदा है. यक़ीनन उनके घुंघरुओं की खनक खोखली है.





