अब मां नहीं, मशीन करेगी इन वन्य जीवों के अंडों की देखभाल

राष्ट्रीय प्राणी उद्यान (दिल्ली चिड़ियाघर) में घड़ियाल के अंडों की रखवाली उनकी मां नहीं, बल्कि मशीनें कर रही हैं। लुप्तप्राय सरीसृपों के संरक्षण के लिए चिड़ियाघर ने पहली बार आर्टिफिशियल इन्क्यूबेशन (कृत्रिम सिकाई) तकनीक का बड़े स्तर पर इस्तेमाल शुरू किया है।
घड़ियाल, मगरमच्छ, कछुआ, धामिन और नाग जैसे जीवों के अंडों को सुरक्षित तापमान और नियंत्रित वातावरण में रखा गया है, ताकि उनके बच्चों के जन्म की संभावना बढ़ सके। इस नई पहल से करीब 15 साल बाद चिड़ियाघर में घड़ियाल अंडों से नया जीवन फूटने की उम्मीद जग गई है।
चिड़ियाघर प्रबंधन के अधिकारी मनोज कुमार ने बताया कि दिल्ली प्राणि उद्यान में वर्ष 2010-11 में आखिरी बार 11 घड़ियालों का जन्म हुआ था लेकिन कुछ ही दिनों में सभी की मौत हो गई थी। कई बच्चों को नर घड़ियाल ने खा लिया था। इसके बाद से यहां घड़ियाल का सफल प्रजनन नहीं हो पाया।
इसी अनुभव को देखते हुए इस बार अंडों को मादा के पास से हटाकर नियंत्रित तापमान वाले इन्क्यूबेटर में रखा गया है। अधिकारियों का कहना है कि सरीसृप प्रजातियों में कई बार नर अंडों को नुकसान पहुंचा देते हैं या अंडों से निकले बच्चों को भी खा जाते हैं। नर में मातृत्व जैसा व्यवहार नहीं होता, जिसे उनके हार्मोनल व्यवहार से जोड़कर देखा जाता है।
प्रजनन चक्र एक सप्ताह से लेकर दो महीने तक
अधिकारियों ने बताया कि अंडे हटाने का एक और फायदा यह है कि कई सरीसृप और पक्षियों में मादा दोबारा अंडे दे सकती है। यह प्रजनन चक्र एक सप्ताह से लेकर दो महीने तक का हो सकता है, जिससे प्रजनन की संभावना और बढ़ जाती है। चिड़ियाघर प्रबंधन के अनुसार, कृत्रिम सिकाई बेहद संवेदनशील प्रक्रिया है।
अंडों को तय तापमान और अनुकूल वातावरण में रखना पड़ता है। तापमान में थोड़ी भी गड़बड़ी भ्रूण को नुकसान पहुंचा सकती है। हालांकि, हर अंडे से बच्चे का जन्म होना जरूरी नहीं होता, लेकिन अब तक की प्रक्रिया सकारात्मक मानी जा रही है।
लुप्तप्राय मगरमच्छों में शामिल सियामिस मगरमच्छ पर भी विशेष ध्यान
चिड़ियाघर में दुनिया के सबसे अधिक लुप्तप्राय मगरमच्छों में शामिल सियामिस मगरमच्छ पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। यहां फिलहाल सियामिस मगरमच्छ का एक जोड़ा मौजूद है, लेकिन पिछले कई वर्षों से इनके बच्चों के जन्म का कोई रिकॉर्ड नहीं है। इसके अलावा एक नर और दो मादा दलदली मगरमच्छ भी हैं, जिनमें अभी तक प्रजनन नहीं हुआ है।
पक्षियों के संरक्षण के लिए भी विशेष इंतजाम किए गए हैं। फिलहाल उनके अंडों की कृत्रिम सिकाई की सुविधा उपलब्ध नहीं है, इसलिए बड़े और सुरक्षित घोंसले बनाए गए हैं। विदेशी पक्षियों के बाड़ों में तापमान नियंत्रित रखने और आवश्यक नमी बनाए रखने के लिए मिस्टिंग सिस्टम लगाया गया है।





