क्या भारत में फिर बढ़ने वाले हैं पेट्रोल-डीजल के दाम?

 ट्रंप प्रशासन द्वारा 17 मई को रूसी कच्चे तेल पर प्रतिबंधों की छूट को समाप्त करने के फैसले ने भारत के सामने एक बड़ा ऊर्जा संकट खड़ा कर दिया है। पिछले कई महीनों से भारत, वाशिंगटन द्वारा दी गई इस ढील का फायदा उठाकर रियायती दरों पर रूसी तेल खरीद रहा था और वैश्विक तेल संकट से बचा हुआ था।

लेकिन अब यह भू-राजनीतिक सुरक्षा कवच हटने से भारत के लिए ऊर्जा का पूरा समीकरण बदल गया है, और यह बदलाव बेहद नाजुक समय पर आया है।

ईरान युद्ध के कारण होर्मुज पहले से ही बाधित

दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल चोकपॉइंट स्ट्रेट ऑफ होर्मुज ईरान युद्ध के कारण पहले से ही बाधित है। टैंकरों की आवाजाही धीमी हो गई है, बीमा लागत बढ़ गई है, और वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें युद्ध शुरू होने से पहले के 72 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 105 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी हैं।

भारत अब दोहरे संकट में फंस गया है। एक तरफ मिडिल ईस्ट से तेल की आपूर्ति अस्थिर है, तो दूसरी तरफ रूसी तेल पर फिर से प्रतिबंधों का खतरा मंडराने लगा है। यह सब ऐसे समय में हुआ है जब कुछ ही दिन पहले भारत में ईंधन की कीमतों में करीब 3 रुपये की बढ़ोतरी की गई है।

रूसी कच्चे तेल पर भारत की निर्भरता

पिछले लगभग दो वर्षों से, रियायती दरों पर मिलने वाला रूसी कच्चा तेल भारत के लिए महंगाई के खिलाफ सबसे बड़ा सुरक्षा कवच बना हुआ था। यूक्रेन युद्ध के बाद जब पश्चिमी देशों ने मॉस्को का बहिष्कार किया, तब भारत ने रूसी तेल की खरीद तेजी से बढ़ाई।

इसके पीछे का अर्थशास्त्र बेहद आकर्षक था। रूसी तेल सस्ता था, माल ढुलाई के रास्ते आसान थे और रिफाइनरियों को अच्छा मुनाफा मिल रहा था। धीरे-धीरे रूस भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बन गया। लेकिन फिर ईरान युद्ध छिड़ गया।

फारस की खाड़ी और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास तनाव बढ़ने से वैश्विक तेल बाजार तेजी से सिकुड़ने लगा। यह डर बढ़ गया कि सऊदी अरब, इराक, कुवैत और यूएई से होने वाली आपूर्ति ठप हो सकती है। इसी संकट को देखते हुए अमेरिका ने प्रतिबंधों को लागू करने में अस्थायी ढील दी थी।

इस छूट के कारण भारत और इंडोनेशिया जैसे देशों को पहले से लोड हो चुके रूसी तेल के जहाजों को बिना किसी तत्काल फाईन के खरीदने की अनुमति मिल गई थी। भारत ने इस छूट को बढ़ाने के लिए काफी दबाव भी बनाया था।

वाशिंगटन ने वैश्विक ऊर्जा स्थिरता का हवाला देते हुए कुछ समय के लिए सहमति तो दे दी, लेकिन अमेरिका के भीतर राजनीतिक दबाव लगातार बढ़ रहा था।

अमेरिकी सांसदों और यूरोपीय सहयोगियों का तर्क था कि यह छूट प्रभावी रूप से मॉस्को की कमाई बढ़ा रही है, जबकि पश्चिम यूक्रेन युद्ध को लेकर रूस को आर्थिक रूप से अलग-थलग करने की कोशिश कर रहा है। रविवार को यह छूट समाप्त हो गई। इसने भारतीय रिफाइनरों के लिए जोखिम का गणित रातोंरात बदल दिया है।

बढ़ती महंगाई का खतरा

भारत की सबसे बड़ी समस्या इसकी अत्यधिक निर्भरता है। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का 85% से अधिक आयात करता है। तेल की कीमतों में होने वाली कोई भी निरंतर बढ़ोतरी सीधे तौर पर महंगाई, सरकारी खजाने, घरेलू बजट और आर्थिक विकास पर चोट करती है।

राहत अवधि के दौरान भारत रूसी कच्चे तेल पर बहुत अधिक निर्भर हो चुका था। केपलर के आंकड़ों के अनुसार, मई में रूस से भारत का तेल आयात रिकॉर्ड 2.3 मिलियन बैरल प्रति दिन तक पहुंच गया था। कुछ महीनों में तो भारत के कुल तेल आयात का लगभग आधा हिस्सा अकेले रूसी कच्चे तेल का था।

वजह साफ थी। रूसी तेल ने वैश्विक कीमतों में लगी आग से भारत को बचा रखा था। लेकिन अब उस छूट के बिना, आगे का गणित बेहद दर्दनाक होने वाला है।

यदि प्रतिबंधों के डर से भारतीय रिफाइनरियों को रूसी तेल की खरीद कम करनी पड़ती है, तो उन्हें मजबूरन फिर से मध्य पूर्व के देशों का रुख करना होगा। वह भी ऐसे समय में जब यह क्षेत्र खुद युद्ध की आग में झुलस रहा है और कीमतें आसमान छू रही हैं।

इससे भारत का तेल आयात बिल भारी भरकम हो सकता है। और यदि तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहीं, तो इसका सीधा असर आम उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ेगा। पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस, हवाई किराया, लॉजिस्टिक्स लागत और खाद्य महंगाई सब कुछ एक साथ ऊपर जाने लगेगा।

सरकार के लिए दोहरी चुनौती

केंद्र सरकार इस समय बेहद मुश्किल दौर से गुजर रही है। इस संकट से निपटने के लिए सरकार के पास सीमित रास्ते हैं, और उनमें से कोई भी राजनीतिक या आर्थिक रूप से आसान नहीं है:

टैक्स कटौती या सब्सिडी: सरकार टैक्स कम करके या सब्सिडी देकर जनता पर पड़ने वाले बोझ को रोक सकती है, लेकिन इससे राजकोषीय घाटा बढ़ेगा।

सरकारी तेल कंपनियों पर दबाव: सरकार सरकारी तेल कंपनियों को इस नुकसान को खुद झेलने के लिए कह सकती है। लेकिन इससे कंपनियों की वित्तीय स्थिति बेहद कमजोर हो जाएगी, जो पहले से ही घाटे से जूझ रही हैं।

कीमतों में फिर बढ़ोतरी: तीसरा विकल्प यह है कि खुदरा ईंधन की कीमतों को फिर से बढ़ने दिया जाए। लेकिन महंगाई के मोर्चे पर मिली हालिया स्थिरता के बाद यह कदम राजनीतिक रूप से बेहद नुकसानदेह साबित हो सकता है।

ऊर्जा अर्थशास्त्रियों का कहना है कि यदि होर्मुज संकट और रूसी प्रतिबंध लंबे समय तक जारी रहते हैं, तो भारत को ईंधन बचाने के पुराने और कड़े उपायों को फिर से लागू करना पड़ सकता है। पिछले ऊर्जा संकटों के दौरान सरकारों ने ईंधन की खपत कम करने के लिए वर्क फ्रॉम होम, दफ्तरों के समय में बदलाव और गैर-जरूरी यात्राओं को कम करने जैसे कदम उठाए थे।

हालांकि, अभी तक आधिकारिक तौर पर ऐसी कोई चर्चा नहीं हुई है, लेकिन मौजूदा स्थिति देशों को लीक से हटकर सोचने पर मजबूर कर सकती है।

अब नई दिल्ली के सामने चुनौती सिर्फ तेल खरीदने की नहीं है, बल्कि सुरक्षित, सस्ते और बिना किसी भू-राजनीतिक तनाव के तेल हासिल करने की है। भारत को एक साथ दो मोर्चों पर संभलकर चलना होगा—खाड़ी में युद्ध का संकट और वाशिंगटन का कूटनीतिक दबाव।

भारतीय उद्योगों पर ईंधन वृद्धि का असर

भारत में हाल ही में हुई ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी के व्यापारिक प्रभावों पर बात करते हुए, पेट्रोस स्टोन एलएलपी के इंटरनेशनल बिजनेस डायरेक्टर ऋषभ जैन ने कहा, “ईंधन की कीमतों में 3 रुपये प्रति लीटर से अधिक की हालिया बढ़ोतरी ऐसे समय में घरेलू लॉजिस्टिक्स और अंतर्राष्ट्रीय माल ढुलाई लागत को बढ़ा रही है, जब निर्यातक पहले से ही उच्च समुद्री माल ढुलाई दरों और मध्य पूर्व कॉरिडोर में अस्थिरता का सामना कर रहे हैं। हालांकि, कमजोर होते रुपये से निर्यात की कमाई में कुछ अस्थायी राहत जरूर मिल रही है, लेकिन यह बढ़ती लागत के दबाव को पूरी तरह से संतुलित करने के लिए नाकाफी है।”

उन्होंने आगे उद्योग की मौजूदा स्थिति को स्पष्ट करते हुए कहा, “इस समय हम पूरे उद्योग जगत में कोई रणनीतिक चपलता नहीं, बल्कि सिर्फ अस्तित्व बचाने का संघर्ष देख रहे हैं। कई निर्माता अपनी वर्किंग कैपिटल को प्रबंधित करने के लिए उत्पादन धीमा कर रहे हैं, अपने मौजूदा स्टॉक को बेच रहे हैं और पुराने इन्वेंट्री से ही ऑर्डर पूरे कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर, बाजार में कम प्रतिस्पर्धी कंपनियां परिचालन बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रही हैं, जिससे इस सेक्टर में धीरे-धीरे एक बड़ा कंसॉलिडेशन देखने को मिल रहा है।”

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