डोगरी-कश्मीरी गीतों में भी बिखेरा था जादू: जब ‘जिंदे मेरिये’ में बसी आशा भोसले की मिठास

आशा भोसले के निधन से जम्मू-कश्मीर समेत पूरे देश में शोक की लहर है, जहां कलाकारों और नेताओं ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी। उन्होंने हिंदी-मराठी के साथ डोगरी और कश्मीरी गीतों में भी अपनी अनूठी आवाज से खास पहचान बनाई जिसे आज भी लोग याद कर रहे हैं।
करीब 92 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कहने वाली मशहूर गायिका आशा भोसले के निधन से जम्मू-कश्मीर के कलाकार भी गमगीन हैं। आशा भोसले ने हिंदी और मराठी के साथ ही डोगरी और कश्मीरी गीतों को भी अपनी आवाज दी। इनमें से एक गीत की शूटिंग पटनीटॉप और सनासर जैसी खूबसूरत जगहों पर हुई।
आशा भोसले ने प्रसिद्ध डोगरी गीत जिंदे मेरिये गाया जिसे उनकी आवाज में पहला डोगरी गाना माना जाता है। इसके अतिरिक्त प्रसिद्ध डोगरी कवयित्री पद्मा सचदेव के साथ एक और मशहूर डोगरी गीत चन्न म्हाड़ा चढ़ेया को भी उन्होंने अपने अलहदा अंदाज में गाया। एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने इस गीत की कुछ पंक्तियां भी गुनगुनाईं जो इस बात की प्रतीक हैं कि उन्हें डोगरी किस कदर पसंद थीं। 80 के दशक में कश्मीरी लफ्जों ‘है अश्क छोरू’ को अपनी खूबसूरत आवाज देकर उन्होंने इस गीत को भी सबका चहेता बना दिया।
मशहूर गजल गायक जितेंद्र सिंह ने आशा भोंसले के निधन को एक अपूरणीय क्षति करार दिया। उन्होंने कहा कि आज की तारीख में घंटो अभ्यास कर अपने अलग अंदाज से गायकी में चार चांद लगा देने वाले गायक नहीं हैं। ईश्वर से कौन लड़ सकता है? लेकिन ऐसे समय में आशा भोसले का जाना बेहद खलने वाला है।
मशहूर गायिका के निधन पर जम्मू-कश्मीर के कलाकार, नेता सब उन्हें अपने-अपने तरीके से याद कर रहे हैं। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने जाइए आप कहां जाएंगे, ये नजर लौटकर फिर आएगी पंक्तियों के जरिये आशा भोसले को याद किया। कहा कि यह महसूस करने की बात है।
वहीं, भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव व जम्मू-कश्मीर प्रभारी तरुण चुघ ने भी आशा भोसले के निधन पर दुख जताया। उन्होंने कहा कि आशा की आवाज भारत के करोड़ों दिलों की आवाज थी। वह ऐसी एक मधुर ध्वनि थी जिसने हर मोड़ पर देश के दर्द को, दुख को, हर्ष को अपने शब्दों में गाया।





