ओमान से अहमदाबाद तक युद्ध के बीच पायलट की जांबाज कहानी

अरब सागर के ऊपर बादलों के पार सब कुछ शांत था, और सैम रदरफोर्ड का छोटा प्रोपेलर विमान लगभग 120 मील प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ रहा था। कॉकपिट के स्पीकर पर ‘वन डायरेक्शन’ बज रहा था। तभी रेडियो पर एक अमेरिकी आवाज सुनाई दी। “आप अंतर्राष्ट्रीय जल क्षेत्र में एक गठबंधन युद्धपोत के करीब पहुंच रहे हैं। आपसे अनुरोध है कि संपर्क स्थापित करें और अपनी पहचान बताएं।”

ईरान के दक्षिण में उड़ते हुए, रदरफोर्ड और सह-पायलट शैनन वोंग ने अमेरिकी सेना का ध्यान अपनी ओर खींच लिया था, जो उस समय मध्य पूर्व में युद्ध में शामिल थी। इंस्टाग्राम पर पोस्ट किए गए उस पल के वीडियो में रदरफोर्ड ने हैरानी के साथ कहा “तो अभी-अभी एक F-16 हमारे बहुत करीब से गुजरा।” (हालांकि बाद में उन्होंने अपनी पोस्ट में स्पष्ट किया, वह असल में एक F/A-18 हॉर्नेट था।)

विमान को भारत पहुंचाने का मिला था जिम्मा

दरअसल, अमेरिका और इजरायल ने ईरान के खिलाफ जिस दिन युद्ध शुरू किया था, उससे एक दिन पहले रदरफोर्ड जो कि ब्रिटिश सेना में पूर्व हेलीकॉप्टर पायलट रह चुके हैं। वह संयुक्त अरब अमीरात के ऊपर से उड़ रहे थे। उस समय, पाइपर पीए-28 के रेडियो पर, वह आस-पास के विमानों की आवाजें सुन सकते थे। जो जल्दी से उतरने के लिए जगह खोज रहे थे, क्योंकि फारसी की खाड़ी एक सक्रिय युद्ध क्षेत्र बन गई थी।

उन्होंने सीएनएन को बताया कि कई विमानों ने अपना रास्ता बदलकर, ओमान की राजधानी मस्कट की ओर मोड़ लिया था। जो आमतौर पर एक शांत हवाई अड्डा है। उतरने के बाद, उन्हें एक फैसला लेना था, या तो मस्कट में रुककर यह देखें कि युद्ध किस दिशा में जाता है; या उस काम को जारी रखें जिसके लिए उन्हें पैसे मिल रहे थे। यानी फ्लोरिडा के वेरो बीच स्थित फैक्टरी से लिए गए इस छोटे विमान को उसके खरीदार तक पहुंचाना, जो भारत में एक फ्लाइट स्कूल था।

उन्होंने बताया कि अगली सुबह तड़के, ओमान का हवाई क्षेत्र खुला हुआ था और हिंद महासागर के रास्ते उनके गंतव्य, अहमदाबाद तक पहुंचना अभी भी संभव था। युद्ध के बदलते हालात को भांपते हुए, उन्होंने “वहां से तुरंत निकल लेने का फैसला किया और भारत के लिए अपनी 900 मील (1,450 किलोमीटर) की यात्रा शुरू कर दी।

ओमान से निकलते ही टकरा गए अमेरिकी लड़ाकू विमान

उनके रवाना होने के लगभग तीन घंटे बाद, ईरान ने ओमान पर हमला कर दिया, जिससे वहां का हवाई क्षेत्र बंद हो गया। लेकिन रदरफोर्ड के वहां से निकलने के फैसले की वजह से ही उनका सामना अमेरिकी लड़ाकू विमानों से हुआ, जिनके पायलट अभी भी उनके जवाब का इंतजार कर रहे थे। क्योंकि उन्हें, यूएसएस अब्राहम लिंकन विमानवाहक पोत की चिंता सता रही थी।

जिसपर 5,000 लोगों का क्रू और 75 विमान तैनात हो सकते हैं। जिसमें वह F/A-18 भी शामिल था जो पास में ही उड़ रहा था, और इस दौरान थोड़ी सी दिक्कत हो गई। रदरफोर्ड ने कहा, “वे हमारी बात सुन नहीं पा रहे थे।” जब उन्होंने फाइटर जेट से रेडियो पर संपर्क करने की कोशिश की, तो कोई जवाब नहीं आया।

इससे कुछ मिनटों के लिए घबराहट सी हो गई। क्योंकि वह जो पाइपर (Piper) विमान लेकर जा रहे थे। वह आमतौर पर इस उड़ान मार्ग पर नहीं देखा जाता है। यह धीमी गति से और 10,000 फीट की ऊंचाई पर उड़ रहा था, जबकि इस मार्ग पर चलने वाले यात्री विमान 30,000 फीट से कहीं ज्यादा ऊंचाई पर उड़ते हैं। लेकिन रदरफोर्ड ने बताया कि जैसे ही संपर्क स्थापित हुआ, एक पल के लिए सब कुछ शांत हो गया।

15 डिग्री का मोड़ लेने से बढ़ जाता खतरा

तब उस अमेरिकी पायलट ने एक और गुजारिश की, अपने रास्ते को उत्तर या दक्षिण की ओर 15 डिग्री बदल लें। रदरफोर्ड ने कहा, “इससे यह बिल्कुल साफ हो गया था कि हम सीधे विमानवाहक पोत की ओर उड़ रहे थे। उसे हमारे बाएं या दाएं जाने से कोई फर्क नहीं पड़ता। बस वह चाहता था कि हम कोई एक दिशा चुन लें।” हालांकि, दोनों में से कोई भी विकल्प सही नहीं था। दक्षिण की ओर खुला हिंद महासागर था। उत्तर की ओर ईरान या पाकिस्तान था, और उसे इन दोनों में से किसी भी देश में जाने की अनुमति नहीं थी।

उन्होंने याद करते हुए बताया कि इसके बाद जो हुआ, वह बाजार में किसी मोल भाव करने जैसा था। नौसेना के जेट पायलट ने थोड़ी नरमी दिखाई। रदरफोर्ड ने शांति से अपनी मजबूरियां बताई। उन्होंने कहा, “अगर मैं जेट पायलट की बात मानकर दक्षिण की ओर चला जाता, तो मेरे छोटे से सिंगल-इंजन वाले विमान का ईंधन हिंद महासागर के ऊपर कहीं खत्म हो जाता।” इसलिए हमें एक ऐसा रास्ता खोजना था। जिससे हर कोई अपने-अपने दायरे में सुरक्षित महसूस करें।”

रदरफोर्ड ने आगे बताया कि, “हमने बिना अपना रास्ता बदले सफर जारी रखा। इस बीच, दो F/A-18 विमान उस छोटे विमान के चारों ओर चक्कर लगा रहे थे। जब उनको लगा कि हमारा विमान यूएसएस अब्राहम लिंकन विमानवाहक पोत से इतनी दूर हो गया कि उन्हें हमें मार गिराने की जरूरत महसूस नहीं हुई, और हम अपने रास्ते के इतने करीब थे कि हमें लगा कि हम वहां सुरक्षित पहुंच जाएंगे।” तो फिर विमानों ने उन्हें धन्यवाद कहा और वहां से चले गए।

Back to top button