स्वतंत्रता और सुरक्षा का हो संतुलन, ताकि विश्वास की डोर रहे हमेशा मजबूत

वह शुक्रवार की शाम थी, जब 16 साल की अनन्या ने अपनी मां से कहा, ‘मम्मी, आज रिया के घर पर लेट नाइट पार्टी है, क्या मैं जा सकती हूं?’ मां के जेहन में एक साथ कई सवाल कौंध गए- सुरक्षा, समय, माहौल और समाज। यह स्थिति आज लगभग हर मध्यमवर्गीय परिवार की है। 16 साल की उम्र वह पड़ाव है जहां पंख फड़फड़ाने की चाहत चरम पर होती है, लेकिन माता-पिता के लिए आसमान की ऊंचाई से ज्यादा उसकी गहराई डराती है।
पहले सुनें फिर बोलें
ऐसी स्थिति अक्सर ही किशोरावस्था की दहलीज पर बैठे बच्चों के माता-पिता के सामने आ जाती है। जब बेटी की सुरक्षा की चिंता और बेटे के कदम डगमगाने की फिक्र में माता-पिता कर जाते हैं ओवरथिंक। परिणामस्वरूप, संवाद किसी भी तरह का हो, माता-पिता की पहली प्रतिक्रिया ‘नहीं’ होती है।
मनोविज्ञानियों का मानना है कि किशोरों के साथ ‘सशर्त सहमति’ का फार्मूला सबसे बेहतर काम करता है। जब बेटी पार्टी की अनुमति मांगे, तो उसे तुरंत खारिज करने के बजाय उससे विस्तार से बात करें। यह पूछना कि ‘वहां कौन-कौन होगा?’ नियंत्रण नहीं, बल्कि आपकी चिंता का हिस्सा होना चाहिए। यूनिसेफ के अनुसार, यदि बच्चा महसूस करता है कि उसे सुना जा रहा है, तो वह आपके द्वारा लगाई गई सीमाओं को बेहतर तरीके से स्वीकार करता है।
सुरक्षा का ब्लू-प्रिंट
पार्टी में जाना सिर्फ नाचने-गाने तक सीमित नहीं है। रात के समय घर वापसी सबसे बड़ा जोखिम होती है। एक जिम्मेदार माता-पिता के तौर पर आपको ट्रांसपोर्टेशन की पूरी जानकारी होनी चाहिए। क्या आप उसे लेने जाएंगे? क्या कोई भरोसेमंद कैब सर्विस है? या वह किसी सहेली के माता-पिता के साथ लौटेगी? इन सवालों के जवाब ‘हां’ कहने से पहले तय होने चाहिए।
जब अनिवार्य हो जाए ‘नहीं’ कहना
हर पार्टी सुरक्षित नहीं होती। यदि आपको पता चले कि पार्टी में कोई वयस्क मौजूद नहीं है या स्थान असुरक्षित है, घर से बहुत दूर है या आपको किसी भी तरह की ज्यादा जानकारी नहीं है तो ‘नहीं’ कहना आपका अधिकार और कर्तव्य है, लेकिन इस ‘नहीं’ को ठोस तर्कों के साथ पेश करें। उसे बताएं कि आपका फैसला उसके प्रति नफरत से नहीं, बल्कि उसकी सुरक्षा के प्रति स्नेह से प्रेरित है।
विकल्प भी हैं जरूरी
पैरेंटिंग विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि अगर आप बच्चे को बाहर जाने से मना करते हैं, तो घर पर ही कुछ दिलचस्प विकल्प दें। जैसे, ‘तुम अपनी सहेलियों को घर पर स्लीपओवर के लिए बुला सकती हो’ या ‘हम कल सुबह किसी फिल्म या आउटिंग पर चल सकते हैं।’ यह बच्चे के मन में पैदा होने वाली चिढ़ को कम करता है। साथ ही जब आप उसे समझाएंगे कि आपकी चिंता नाहक नहीं है, तो संतान समझ ही जाएगी।
डिजिटल चुनौतियां भी हैं
आज के समय में चुनौतियां सिर्फ शारीरिक सुरक्षा तक सीमित नहीं हैं। इंटरनेट मीडिया पर लाइव वीडियो या फोटो पोस्ट करने से भी सुरक्षा जोखिम बढ़ सकते हैं। अपनी बेटी को ‘डिजिटल फुटप्रिंट्स’ के बारे में जागरूक करें। उसे बताएं कि पार्टी की तस्वीरें साझा करते समय अपनी प्राइवेसी का ध्यान कैसे रखना है।
संतुलन ही समाधान है
अंततः, पैरेंटिंग एक संतुलन का खेल है। यदि आप बहुत अधिक सख्ती करेंगे, तो बच्चा झूठ बोलना शुरू कर देगा। यदि आप बहुत अधिक ढील देंगे, तो जोखिम बढ़ जाएगा। 16 साल की बेटी को लेट नाइट पार्टी में जाने देना या न देना, केवल एक रात का फैसला नहीं है, बल्कि यह आपके और उसके बीच के रिश्तों की मजबूती की परीक्षा है। अपने बच्चे को एक स्वतंत्र और सुरक्षित इंसान बनाने के लिए उसे उड़ने दें, लेकिन यह सुनिश्चित करें कि उसका धागा आपके हाथ में रहे। आपका उद्देश्य उसे कैद करना नहीं, बल्कि उसे इतना काबिल बनाना है कि वह खुद अपनी सुरक्षा और सीमाओं की पहचान कर सके।
विश्वास और जिम्मेदारी का अनुबंध
16 साल की उम्र में बच्चा न तो छोटा होता है और न ही पूरी तरह परिपक्व। इस स्थिति में ‘विश्वास’ को एक निवेश की तरह देखें। अपनी बेटी से कहें, ‘मैं तुम पर भरोसा करती हूं, लेकिन माहौल पर नहीं।’ उसे समझाएं कि स्वतंत्रता जिम्मेदारी के साथ आती है। आप एक ‘सेफ्टी कांट्रैक्ट’ बना सकते हैं, जिसमें कुछ बुनियादी नियम हों-
लोकेशन शेयरिंग- उसे समझाएं कि सुरक्षा के लिए उसका लाइव लोकेशन साझा करना अनिवार्य है।
चेक-इन काल्स- हर दो घंटे में एक छोटा सा मैसेज या काल, ताकि आप निश्चिंत रह सकें।
ड्रिंक और ड्रग्स- इस संवेदनशील मुद्दे पर खुलकर बात करें। उसे दोस्तों की ओर से पड़ने वाले दबाव से निपटने के तरीके सिखाएं।





