सोमनाथ मंदिर पर गजनवी के हमले के 1000 साल, मुस्लिम शासकों ने कई बार तोड़ा

यत्र गंगा च यमुना। यत्र प्राची सरस्वती।
यत्र सोमेश्वरो देवः तत्र माममृतं कृधी।
इन्द्रायेन्दो परिस्त्रव॥

अर्थात.. जहां गंगा और यमुना की धाराएं बहती हैं, जहां अदृश्‍य रूप से सरस्वती का प्रवाह आज भी चेतना को स्पर्श करता है और जहां स्वयं देवों के देव महादेव (स्वामी सोमेश्वर) विराजमान हैं- वह स्थान केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि भारतीय आत्मा का आद्य केंद्र है। हे प्रभु! इस पवित्र स्थान पर अमृत्‍व प्रदान करें।

इस श्‍लोक के मायने अत्यंत गहरे और दूरगामी हैं। यह श्‍लोक इस बात का भी सबूत है कि सोमनाथ मंदिर मानव इतिहास, लिखित स्मृतियों और सत्ता-परिवर्तनों से भी पहले से उस पवित्र भूमि पर विद्यमान रहा है, जिसका उल्लेख इसमें किया गया है।

आज हम मंदिर पर हुए उस पहले आक्रमण की 1000वीं स्‍मृति को याद कर रहे हैं, जब आक्रांता महमूद गजनवी ने सोमनाथ मंदिर को ध्वस्त कर दिया था। छह टन से ज्‍यादा सोना लूटकर ले गया था। श्‍लोक याद दिलाता है- 1000 साल पहले महमूद ने मंदिर तबाह किया। इसके बाद कई और विदेशी आक्रमणकारियों ने मंदिर खंडहर में बदला। इसके बावजूद आस्‍था नहीं टूटी।

समुद्र की लहरों के साथ सांस लेता, समय की मार सहकर भी अडिग खड़ा सोमनाथ मंदिर आज भी आस्था का वह शाश्वत केंद्र है, जहां विनाश पराजित हुआ और विश्वास विजयी रहा। यह मंदिर केवल एक संरचना नहीं, बल्कि हजारों वर्षों के संघर्ष, स्वाभिमान और पुनर्जन्म की जीवित कथा है। यह पत्‍थर और गारे से नहीं, श्रद्धा, विश्वास और संकल्प से मजबूत व झगमग है।

सोमनाथ स्वाभिमान पर्व: 11 जनवरी को पीएम मोदी जाएंगे 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 11 जनवरी को गुजरात स्थित सोमनाथ मंदिर में आयोजित ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व एवं समारोह’ में भाग लेने जा रहे हैं। जहां मदिर परिसर में तैयारियां अंतिम चरण में है तो दूसरी ओर देश भर में सोमनाथ की अखंडता, आत्मसम्मान, आस्था और संघर्ष की गौरवगाथा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है।

सोमनाथ स्वाभिमान पर्व एवं समारोह सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं है। यह उस राष्ट्रीय आत्मगौरव का उत्सव है, जिसने बार-बार ध्‍वस्‍त होने के बावजूद भी हार मानने से इनकार किया। सोमनाथ की पुनर्स्थापना केवल एक मंदिर का पुनर्निर्माण नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना के पुनर्जागरण का प्रतीक रही है।

महमूद गजनवी कौन था?

गजनी के बादशाह सुबुक तिगीन का साल 997 में निधन हुआ तो बड़ा बेटा महमूद गद्दी पर बैठा। जबकि वह न गद्दी के लिए पिता सुबुक तिगीन की पसंद था और न उसे उत्तराधिकारी चुना था। सुबुक तिगीन ने अपने छोटे बेटे इस्माइल को अपना उत्तराधिकारी चुना था, लेकिन उनकी मौत के बाद गद्दी का फैसला तलवार से हुआ था, पिता की इच्‍छा से नहीं।

जब पिता की मौत हुई थी, तब महमूद खुरासान में था। उसने वहां से अपने छोटे भाई इस्माइल को एक चिट्ठी भेजी कि अगर वह महमूद के लिए गद्दी छोड़ता है तो इसके एवज में बल्‍ख और खुरासान का गर्वनर बन सकता है।

जब छोटे भाई ने प्रस्‍ताव ठुकरा दिया तो महमूद ने अपनी सेना के साथ गजनी पर आक्रमण किया। जंग में छोटे भाई इस्‍माइल को हराकर कैद में डाल दिया और खुद 27 साल की उम्र में गजनी की गद्दी संभाल ली।

बता दें कि खुरासान यानी नॉथ-ईस्‍ट ईरान, ज्‍यादातर अफगानिस्‍तान और कुछ हिस्‍से तुर्कमेनिस्तान, उज्‍बेकिस्‍तान और ताजिकिस्तान में हैं।

हिंदू मंदिरों पर ही आक्रमण क्‍यों करता था गजनवी?

अब्राहम इराली की किताब ‘द एज ऑफ रॉथ’ के मुताबिक, भारत के हिंदू मंदिरों में अपार धन हुआ करता था। ऐसे में मंदिरों का विध्‍वंस करना महमूद गजनवी में एक ओर जहां धार्मिक जोश भरता था तो दूसरी ओर आपार दौलत भी मिलती।

कई बार तो इतना बड़ा खजाना मिल जाता था, जिसकी उसने अपनी जिंदगी में कभी कल्‍पना तक नहीं की थी। लूटपाट के अलावा बड़ी संख्‍या में भारतीय महिलाओं-पुरुषों और बच्‍चों को गुलाम बनाकर अपने साथ ले जाता था। फिर अपने यहां उनसे न सिर्फ गुलामी कराता, बल्कि गुलामों के व्‍यापारियों को बेचता भी था। यही वजह है कि महमूद गजनवी ने अपने 32 साल के शासन में भारत पर 17 हमले किए।

महमूद गजनवी ने कहां-कहां मंदिर तोड़े?

गजनी की गद्दी संभालने के बाद से साल 1024 तक महमूद ने मुल्‍तान, पंजाब, गांधार, नगरकोट, कन्नौज, बुलंदशहर, मथुरा, कालिंजर, ग्वालियर, सिंध की रियासतों और मंदिरों में लूटपाट व मारकाट कर चुका था। अभी सोमनाथ मंदिर उसकी पहुंच से दूर रहा था।

कैसा था सोमनाथ मंदिर?

मशहूर यात्री अल-बरूनी ने सोमनाथ के बारे में लिखा था-

‘सोमनाथ मंदिर का निर्माण महमूद के हमले से कोई सौ साल पहले हुआ था। यह किलेनुमा इमारत के भीरत पत्‍थर से बना बेहद भव्‍य और जीवंत था। किलानुमा इमारत तीनों ओर से समुद्र से इस कदर घिरी थी कि देखने वालों को लगता था जैसे- समुद्र इसकी पहरेदारी कर रहा हो।

हिंदुओं के लिए इस मंदिर का स्‍थान बहुत ऊंचा था। मंदिर में मुख्‍य मूर्ति शिव की (शिवलिंग) थी। यह कोई साधारण मूर्ति नहीं थी। शिवलिंग (बिना किसी सहारे) जमीन से दो मीटर की ऊंचाई पर रखा था। उसके अगल-बगल में सोने और चांदी से बनी कुछ और मूर्तियां स्‍थापित थीं।’

मशहूर इतिहासकार जकरिया अल काजविनी ने लिखा-

सोमनाथ की मूर्ति (शिवलिंग) मंदिर के बीचों-बीच रखी थी। चंद्र ग्रहण के वक्‍त यहां लाखों की संख्‍या में हिंदू तीर्थयात्री आया करते थे। यह बेहद समृद्ध और संपन्‍न मंदिर था। जहां शताब्दियों से खजाना जमा था। हर दिन मंदिर से 1200 किलोमीटर दूर से गंगाजल लाया जाता था, जिससे सोमनाथ का जलाभिषेक किया जाता था।

मंदिर की पूजा और तीर्थयात्रियों की सेवा के लिए 1000 से ज्‍यादा ब्राह्मण थे। मंदिर के मुख्‍य द्वार पर 500 से ज्‍यादा महिलाएं भजन-कीर्तन करतीं, भक्तिमय संगीत की धुन पर थिरकती रहती थीं।

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