सिर्फ जेनेटिक नहीं होतीं नर्वस सिस्टम की बीमारियां…

बच्चों में नर्वस सिस्टम से जुड़ी बीमारियां अक्सर चिंता का विषय होती हैं। ये बीमारियां बच्चे के मस्तिष्क, रीढ़ की हड्डी और नसों को प्रभावित करती हैं। आमतौर पर माना जाता है कि इसका कारण आनुवंशिक, चोट या जन्मजात संक्रमण होता है, लेकिन हाल ही में चूहों पर किए गए एक नए शोध ने यह खुलासा किया है कि गर्भावस्था के दौरान मां का तनाव और स्वास्थ्य भी बच्चे के दिमागी विकास पर सीधा असर डाल सकता है।
नेचर न्यूरोसाइंस का नया खुलासा
‘नेचर न्यूरोसाइंस’ जर्नल में प्रकाशित एक ताज़ा अध्ययन में वैज्ञानिकों ने यह पता लगाया है कि गर्भावस्था के दौरान तनाव, आंत में होने वाले बदलाव या इम्यून सिस्टम के एक्टिव होने से भ्रूण के मस्तिष्क पर क्या असर पड़ता है। अमेरिका के ‘बोस्टन चिल्ड्रन हॉस्पिटल’ के प्रमुख शोधकर्ता और चिकित्सक डॉ. ब्रायन कालिश ने बताया कि उनकी टीम ने यह समझने की कोशिश की है कि विकास के दौरान भ्रूण के दिमाग में जीन कैसे काम करते हैं।
आधुनिक तकनीक से तैयार किया ‘जीन का नक्शा’
इस शोध के लिए वैज्ञानिकों ने ‘स्पेशल ट्रांसक्रिप्टोमिक्स’ नामक एक एडवांस तकनीक का इस्तेमाल किया। यह तकनीक यह पता लगाने में मदद करती है कि शरीर के किसी ऊतक में कौन से जीन एक्टिव थे और उनकी सटीक जगह क्या थी।
डॉ. कालिश के अनुसार, पुराने अध्ययनों में अक्सर वयस्क मस्तिष्क पर ध्यान दिया जाता था, लेकिन इस नए शोध में उस नाजुक समय का डेटा इकट्ठा किया गया है जब भ्रूण का दिमाग विकसित हो रहा होता है और सबसे ज्यादा संवेदनशील होता है।
लड़कों के मस्तिष्क में देखी गई खास संवेदनशीलता
अध्ययन में एक बेहद चौंकाने वाली बात सामने आई। शोधकर्ताओं ने पाया कि भ्रूण के लिंग का भी इस प्रक्रिया पर असर पड़ता है। उन्होंने ‘नर’ मस्तिष्क में एक विशेष इम्यून पथ के प्रति संवेदनशीलता देखी। यह खोज भविष्य में लड़कों में होने वाले तंत्रिका विकारों को समझने और उनके इलाज के लिए एक महत्वपूर्ण लक्ष्य साबित हो सकती है।
दिमागी बनावट में दोष का कारण
टीम ने एक विशेष सिग्नलिंग रास्ते की भी पहचान की है, जिसे ‘CXCL12/CXCR4’ कहा जाता है। यह रास्ता न्यूरल स्टेम सेल्स को सही तरीके से ‘न्यूरॉन्स’ (दिमागी कोशिकाओं) में बदलने के लिए बेहद जरूरी है। अगर इस रास्ते में गड़बड़ी होती है, तो कोशिकाएं गलत तरीके से विकसित हो सकती हैं, जिससे बच्चे के दिमाग में संरचनात्मक या कार्यात्मक दोष पैदा हो सकते हैं।
भविष्य के लिए उम्मीद की किरण
यह शोध बताता है कि कैसे मां के पेट का वातावरण और बाहरी कारक (जैसे तनाव या माइक्रोबायोम की कमी) बच्चे के दिमाग के इम्यून सिस्टम को ‘प्रोग्राम’ करते हैं। डॉ. कालिश का मानना है कि एक नवजात रोग विशेषज्ञ के रूप में, यह जानकारी बहुत महत्वपूर्ण है। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि शुरुआती जीवन के पर्यावरणीय कारक दिमाग के विकास को कैसे प्रभावित करते हैं, जिससे भविष्य में इन बीमारियों को रोकने या इलाज करने के नए रास्ते खुलेंगे।





