इस देश ने क्यों संभालकर रखी हैं गुलामों की खोपड़ियां? वजह हैरान करने वाली

भारत समेत दुनिया के ज्यादातर मुल्कों ने गुलामी झेली है. उनके साथ बहुत अत्याचार भी किए गए. उनके धर्मस्थल लूटे गए. लोगों को प्रताड़ित किया गया. अंग्रेज उनकी संपत्तियां लूटकर साथ ले गए. लेकिन एक मुल्क ऐसा भी है, जिसने दुनिया के कई देशों के लोगों के कंकाल, उनकी खोपड़ी अपने पास रख लिया है. कई बार इसे वापस लेने देने की गुहार लगाई गई, लेकिन यह मुल्क देने को तैयार नहीं है. वजह जानकर आप भी हैरान रह जाएंगे.
हम बात कर रहे जर्मनी की. औपनिवेशिक काल के दौरान पूर्वी अफ्रीकी देशों के 1000 से जयादा लोगों की खोपड़ियां यहां की सरकार अपने साथ लेकर आई थी और इन्हें आज भी राजधानी बर्लिन में एक संंग्रहालय में रखा गया है. कंकालों को लाने का मकसद अलग अलग नस्ल के लोगों का वैज्ञानिक अध्ययन करना था, ताकि जाना जा सके कि वे इतने मजबूत कैसे होते हैं. कई बार इसकी कोशिश भी हुई, लेकिन कोई खास नतीजा अब तक निकलकर नहीं आया.
फाउंडेशन के पास 5,600 कंकाल
सरकारी संस्था प्रशियन कल्चरल हेरिटेज फाउंडेशन के पास 5,600 कंकाल मौजूद हैं. इनमें रवांडा के लोगों की 1000 से अधिक खोपड़ियां जबकि तंजानियाई मूल के कम से कम 60 लोगों की खोपड़ी शामिल है. दोनों देशों पर जर्मनी ने 1885 से 1918 के बीच शासन किया था. उसी वक्त इन कंकालों को लाया गया था. कहा जाता है कि ये कंकाल उन लोगों के हैं, जिन्होंने जर्मन सेनाओं से बगावत की थी और उनके खिलाफ युद्ध शुरू कर दिया था. बाद में जर्मन सेना ने इन्हें मार गिराया था. इन्हें गुलाम विद्रोही बताया गया है. ये विद्रोही इतने ताकतवर थे कि जर्मन सेना को नाको चने चबाने पर मजबूर कर दिया था.
राजदूत ने खोपड़ियों को वापस करने की मांग की
हाल ही में रवांडा के राजदूत ने इन खोपड़ियों को वापस करने की मांग की थी, लेकिन सरकार राजी नहीं. फाउंडेशन के प्रमुख ने कहा, कंकालों को वापस देने में कोई परेशानी नहीं है. लेकिन सबसे जरूरी है कि अवशेषों को लौटाने से पहले उनका मिलान करना होगा. साइंटिफिक रूप से पुष्टि होनी चाहिए. ऐसा नहीं है कि रवांडा पहली बार मांग कर रहा है. इससे पहले जर्मनी ने ऑस्ट्रेलिया, पैराग्वे और अपनी पुरानी कॉलोनी नामीबिया को उसके अवशेष वापस किए हैं.





