Mothers Day: इस मां के संघर्ष से बेटी डॉक्टर बनी और बेटे का इंडियन रेवेन्यू सर्विसेज में चयन हुआ

पुंछ जिले में नियंत्रण रेखा (एलओसी) से 15 किलोमीटर दूर सटा गांव सलवा कभी आतंकग्रस्त था। बुनियादी सुविधाओं से भी गांव जूझ रहा था। एक महिला के संघर्ष ने गांव की पहचान बदल दी। आज सलवा गांव से दो भारतीय प्रशासनिक अधिकारी (आइएएस) निकले हैं। प्रवीण अख्तर ने सलवा से लेकर जम्मू तक की गलियों में संघर्ष किया। उसका परिणाम यह हुआ कि दोनों बच्चे मां के लिए आसमान से तारे तोड़ ले आए। बेटे ने वर्ष 2018 में तो बेटी ने 2019 में घोषित सिविल सर्विस की परीक्षा में परचम फहराया।

प्रवीण अख्तर जम्मू की रहने वाली हैं।

वर्ष 1988 में उनकी शादी पुंछ जिले की मेंढर तहसील के सलवा गांव में रहने वाले मोहम्मद बशीर के साथ हुई। प्रवीण कृषि विभाग में और उनके पति स्टेट फारेस्ट कॉरपोरेशन में मैकेनिक थे। गांव में सड़क तक नहीं थी। नब्बे के दशक में यह क्षेत्र आतंकवाद से ग्रस्त था। मेंढर में तो लोग जाने से भी कतराते थे। उस दौरान प्रवीण अख्तर जम्मू में आ गई। यहां रेहाना बशीर और आमिर बशीर को जन्म दिया। वह दोनों बच्चों का बेहतर भविष्य बनाना चाहती थी। उन्होंने दोनों को जम्मू के आर्मी पब्लिक स्कूल रतनूचक में प्रवेश दिलाया। दोनों बच्चे सातवीं और आठवीं कक्षा में ही थे कि मोहम्मद बशीर की वर्ष 2006 में बीमारी के कारण मृत्यु हो गई। यहीं से प्रवीण अख्तर का संघर्ष शुरू हो गया। नौकरी और दोनों बच्चों को पालने की जिम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर पड़ गई।

प्रवीण का कहना है कि उस समय सब कुछ आसान नहीं था। बच्चे छोटे थे। उन्हें पालने के लिए पिता की जिम्मेदारी संभालनी पड़ी। बच्चे भी यह बात समझते थे। जब वे बड़े हुए तो उन पर दबाव था कि बेटे को एसआरओ-43 में स्टेट फारेस्ट कॉरपोरेशन में नौकरी दिलवा दूं। उन्हें पता था कि उनके बच्चे मां के संघर्ष को समझते हैं। मैंने मना कर दिया। बेटी रेहाना ने शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल सांइसेज में एमबीबीएस की तो बेटे आमिर ने जम्मू में इंजीनियरिंग कॉलेज में सीट निकाल ली। दोनों बच्चे इससे भी संतुष्ट नहीं थे। बेटे आमिर ने इंजीनयरिंग की तो उसका चयन स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में प्रोबेशनर ऑफिसर पद पर हो गया। उसने नौकरी ज्वाइन नहीं की। उसने सिविल सर्विसेज की परीक्षा दी और उसमें सफल हो गया। इस समय वह इंडियन रेवेन्यू सर्विसेज में है।

बेटी डॉ. रेहाना ने भी जब एमबीबीएस की तो उसने कहा कि मां मैं डॉक्टर बनकर अपने क्षेत्र के लिए वह नहीं कर सकती जो कि सिर्विल सर्विसेज करने के बाद कर सकती हूं। साल 2017 में हुई परीक्षा में तो पास नहीं हुई मगर अगले साल जब उसने परीक्षा दी तो पूरे क्षेत्र में आइएएस करने वाली पहली महिला बन गई। डॉ. रेहाना इस साल जम्मू-कश्मीर की टॉपर थी। दोनों सफलता का पूरा श्रेय मां प्रवीण अख्तर को देते हैं।

मां के कारण ही आइएएस

मां ने संघर्ष करके हमें बड़ा किया है। यह उनकी मेहनत का ही परिणाम है कि आज मैं सिविल सर्विसेज में सफल हुई हैं। एमबीबीएस करने के बाद पहली बार परीक्षा में असफल रहने के बावजूद उन्होंने हौसला बढ़ाया और इस साल 187वां रैंक हासिल कर सकी। मां ने पिता का प्यार भी दिया है। मां उनके जीवन में सबसे खास है।

डॉ. रेहाना अख्तर, आइएएस

मां ने बेहतर शिक्षा और संस्कार दिए

मां ने हमें पढ़ाया। उनकी मेहनत के कारण ही आज वह इस मुकाम पर हैं। पहले इंजीनियङ्क्षरग की। फिर बैंक पीओ। दो बार सिविल सर्विसेज की परीक्षा दी। आज आइआरएस अधिकारी हूं। इसका पूरा श्रेय मां को ही जाता है। उन्होंने हमेशा बेहतर शिक्षा और संस्कार दिए।

आमिर बशीर, आइआरएस

गांव की हालत में करें सुधार

प्रवीण अख्तर का कहना है कि हम एक पिछड़े हुए गांव सलवा के रहने वाले हैं। बेटी ने जब सिविल सर्विसेज की चयन सूची में नाम दर्ज करवाया तो गांव में गए लेकिन वहां की कच्ची सड़कें और सुविधाएं न होना बहुत ही दुख देती हैं। मुझे उम्मीद है कि दोनों बच्चे इस गांव की हालत में भी सुधार के लिए काम करेंगे ताकि वहां कि वे माताएं जोकि जम्मू में आकर अपने बच्चों के लिए संघर्ष नहीं कर पाती हैं, उनके बच्चे वहीं पढ़कर सफल हों और देश की सेवा कर सकें।

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