माँ से बढ़ कर कोई गुरु नहीं होता

पहली धरकन भी मेरी, धरकी की तेरे भीतर जमीन को तेरी छोरकर बता फिर में जाऊ कहा. आँखे खोली जब पहली दफ़ा तेरा चेहरा ही दिखा जिंदगी का हर लम्हा जीना तुझसे ही सिखा.
खामोश सी मेरी जुबाह को सुर भी तुने ही दिया श्वेत पड़ी मेरी अभिलाशाओ को रंगों से तूने भर दिया.
अपना निवाला छोर कर मेरी खातिर तूने भण्डार भरे…. में भले नाकामियाब रही फिर भी मैरे होने का तूने अहंकार भरा.
वो रात को छिपकर जब तू अँधेरे में अकेले रोया करती थी दर्द होता था मुझे भी शिश्किया मैंने भी सुनी थी….. नासमझ थी में जब इतनी खुद का भी मुझे भान नही था तू ही बस वो एक थी जिसे मेरी भुक प्यास का पता था.
”किसी का दिल तोडना आज तक नही आया मुझे, प्यार करना जो अपनी माँ से सीखा है मेने…”
जब एक रोटी के चार टुकड़े हों और खाने वाले पाँच.. तब मुझे भूख नहीं है ऐसा कहने वाली इंसान है – माँ !
पहले जब मै बेतहाशा धुल मैं खेला करती थी तेरी चूडियो तेरी पायल की आवाज से डर लगता था, लगता था तू आयेगी बहुत डाटेगी और कान पकड़ कर मुझे ले जाएगी.
माँ आज भी जब किसी दिन मुझे धुँध-धुंध सा लगता है. चूडियो के बीच से तेरी उड़ते गुस्से भरी आवाज को सुनने का मन करता है, मन करता है तू आजाये बहुत डांटे और कान पकड़ कर मुझे ले जाये.
जाना चाहती हूँ उस बचपन में फिरसे जहाँ तेरी गोद में सोया करती थी. जब काम ना हो कोई मेरे मन का तो हर बात पर रोया करती थी जब बिना तेरी लोरियो, कहानियों के लिए पलके जगा नही करती थी माथे पर बिना तेरे मीठे स्पर्श के ये आँखे जगा नही करती थी.
अब और नही घिसने देना चाहती तेरे इन मुलायम हाथों को, चाहती हूँ पूरा करना तेरे सपनों में दिखे हर बातों को…… खुश होगी माँ एक दिन तू भी जब लोग मुझे तेरी बेटी कहेंगे.






