पैर से लेकर सिर तक ढके, लेकिन श्रद्धा का भाव किसी में भी कम नहीं

”रमज़ान आया , रमज़ान आया, रहमतों की बरकतों का महीना आया, लूट लो नेकियाँ जितना लूट सकते हो पूरे एक साल में ये ऑफर का महीना आया हैं।”
उमस से भरी दोपहर ढलान की ओर है। आकाश पीली चादर ओढ़ने लगा है। आकाश में छिड़े नीले और पीले रंगों के द्वंद्व देखने में अच्छे लग रहे हैं। निजामुद्दीन की ओर जाने वाले रास्ते के दोनों ओर की दुकानों में लाइटें जल गई हैं। चहल-पहल से भरे संकरे रास्ते पर चंद कदम आगे बढ़ते ही गुलाब के फूलों की महक जैसे नया जोश भर देती है।
गुलाब के फूल, चादर समेत अन्य पूजा सामग्रियों की दुकानों पर श्रद्धालु खरीदारी कर रहे हैं। कुछ दुकानें धर्म के प्रतीक चिन्हों और किताबों से भरी हैं। दुकानदार अपनी दुकान पर आने की मनुहार कर रहे हैं। लोग जूता-चप्पल दुकानों के सामने निकालकर हाथों में पूजा का सामान लिए आगे बढ़ रहे हैं। कोई पत्नी के साथ है तो कोई दोस्त के साथ, आधुनिक विदेशी परिधानों से लेकर पैर से लेकर सिर तक ढके, लेकिन श्रद्धा का भाव किसी में भी कम नहीं। दरगाह तक पहुंचते-पहुंचते गलियों के ऊपर से पीलापन लिए आकाश गायब हो जाता है।

”सुनहरी धुप बरसात के बाद ,थोड़ी सी हंसी हर बात के बाद , उसी तरह यह रमज़ान मुबारक हो पिछले रमज़ान के बाद”





