यहां इंसान का रह पाना नामुमकिन, फिर भी मिली ऐसी चीज जानकर उड़ जाएंगे होश

अंटार्कटिका को दुनिया का आखिरी कोना कहा जाता है। ये ऐसा इलाका हैं जहां हदे-निगाह तक सिर्फ बर्फ नजर आती है। इस महाद्वीप पर इंसान का रह पाना बहुत मुश्किल है, लेकिन हैरत की बात ये है कि यहां की बर्फ में इंसानों के कुछ अवशेष मिले हैं जो अपने पास कई राज छुपाये हुए हैं।

इस मुश्किल जगह पर बहुत से वैज्ञानिक और खोजकर्ता पहुंचे, लेकिन उनमें से बहुतों के शव तक नहीं मिले। उनकी मौत एक रहस्य ही बनी रही। अंटार्कटिका पर लिविंगस्टन नाम का एक द्वीप है। यहां साल 1980 में चिली के खोजकर्ताओं को एक महिला की खोपड़ी और जांघ की हड्डी मिली जो कि 175 साल पुरानी है। ये एक दावा है कि वो महिला चिली की स्थानीय निवासी थी। इसकी मौत 21 साल की उम्र में साल 1819 से 1825 के दरमियान हुई थी। बताया जा रहा है कि अंटार्कटिका पर ये अब तक का सबसे पुराना इंसानी अवशेष है।

समुद्री खोजकर्ता
जिस जगह पर इस महिला के अवशेष मिले हैं, वो दक्षिणी चिली से करीब एक हजार किलोमीटर दूर है। सवाल ये उठता है कि आख़िर वो महिला यहां तक पहुंची कैसे। क्योंकि डोंगियों के जरिए इतना लंबा सफर तय करना संभव नहीं है। चिली के खोजकर्ता विलियम स्मिथ का कहना है कि उत्तरी गोलार्ध से अंटार्कटिका आने वाले समुद्री खोजकर्ताओं के लिए ये महिला स्थानीय गाइड थीं।

अर्जेंटीना की साइंटिफिक एंड टेक्निकल रिसर्च काउंसिल के पुरातत्वविद मेलिसा सलर्नो का कहना है कि दक्षिणी चिली के लोगों के साथ सीलरों के अच्छे रिश्ते थे। कभी-कभी वो सील की खाल, अपने तजुर्बे और जानकारियां भी उनसे साझा करते थे। लेकिन दोनों की संस्कृति एक दूसरे से अलग थी। लिहाजा कभी-कभी दोनों के बीच झगड़े भी होते थे। ये नाविक औरतों को उठाकर ले जाते थे और दूर ले जाकर बेसहारा छोड़ देते थे। चूंकि उस दौर की घटनाओं के कोई लिखित सबूत नहीं हैं, इसीलिए इस महिला का बारे में कोई पुख्ता जानकारी भी नहीं है।

खास मौका
लेकिन अंटार्कटिका पर इस महिला की हड्डियां इस बात का सबूत हैं कि उस दौर में यहां इंसान ने आना शुरू कर दिया था। 17 मार्च 1912 को ब्रिटेन के रॉबर्ट फाल्कन स्कॉट 60 खोजकर्ताओं की टीम के साथ दक्षिणी ध्रुव पर रिसर्च के लिए पहुंचे। उन्हें लगता था कि उनकी टीम इस ध्रुव पर पहुंचने वाली पहली टीम होगी, लेकिन उनके यहां पहुंचने से महज तीन हफ्ते पहले ही नॉर्वे की एक टीम यहां से लौटकर आई थी। जब स्कॉट की टीम को ये बात पता चली तो उनका मनोबल टूट गया लेकिन, देशवासियों की उम्मीदों का दबाव इतना ज्यादा था कि वो अपने कदम पीछे नहीं हटा सके। खुद इन खोजकर्ताओं के लिए भी ये मौका बहुत खास था।

एक डायरी
मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर मैक्स जॉन्स का कहना है कि मौसम की सख्त मिजाजी देखते हुए फॉल्कन खुद आश्वस्त नहीं थे कि वो जिस काम के लिए निकले हैं वो उसे पूरा पाएंगे, लेकिन टीम का हौसला अटल था।
लिहाजा वो आगे बढ़ते गए, लेकिन वापसी का रास्ता आसान नहीं रहा। टीम के साथियों की हिम्मत जवाब देने लगी। फरवरी महीने में टीम के साथी ईगर ईवान और लॉरेंस ओट्स की मौत हो गई। उन्हें वहीं बर्फ में दफना दिया गया। फॉल्कन को डर सताने लगा था कि शायद वो अपने सभी साथियों के साथ देश वापिस नहीं लौट सकेंगे। वो एक डायरी में अपनी पूरी यात्रा का विवरण लिख रहे थे।

फॉल्कन की डायरी से ही पता चलता है कि उन्होंने कितना मुश्किल भरा वक्त गुजारा था। उन्होंने लिखा है कि टीम जानती थी कि टेंट से 18 किलो मीटर की दूरी पर उन्हें ख़ुद को बचाने का बंदोबस्त मिल जाएगा, लेकिन बर्फीले तूफानों ने बाहर निकलने का मौका ही नहीं दिया। सभी लोग अपने तंबुओं में कैद हो गए और कमजोरी की वजह से एक-एक करके दम तोड़ने लगे। कई महीने बाद सर्च टीम को विल्सन, हेनरी और स्कॉट के शव और सामान तो मिल गए, लेकिन ईगर ईवान और लॉरेंस ओट्स के शव कभी नहीं मिले। स्कॉट की डायरी में आखिरी एंट्री 29 मार्च 1912 की है। हो सकता है इसी दिन उनकी मौत हुई हो। अंटार्कटिका की जमीन बर्फ की चादर है और इसमें पड़ी दरारें मौत के कुएं। साल 1965 में ऐसी ही एक दरार ने तीन वैज्ञानिकों को ख़ुद में समा लिया था। हैली रिसर्च स्टेशन के ये चारों वैज्ञानिक मसकेज ट्रैक्टर से वेडेल सागर से गुज़र रहे थे।

बर्फीली जमीन में दरारें
मसकेज ट्रैक्टर खास तरह के होते हैं जो दलदल और बर्फीले इलाकों में चलते हैं। इनके साथ एक स्लेज जुड़ी होती है और एस्किमो कुत्तों की टीम साथ चलती है। तीन वैज्ञानिक कैब में बैठे थे जबकि जॉन रोस स्लेज पर थे। जेरेमी बेली, ट्रैक्टर चला रहे थे और बर्फ की मोटाई माप रहे थे। डेविड वाइल्ड और जॉन विल्सन आगे की बर्फ देख रहे थे। अचानक स्लेज रूक गई और बर्फ में धंसने लगी।

रोस ने अपने साथियों को करीब 20 मिनट तक आवाज दी तब कहीं बेली की आवाज आई कि डेविड मर चुका है और जेरी बर्फ में फंसा हुआ है। रोस ने इन्हें बचाने की कोशिश की लेकिन कुछ देर बाद बेली की आवाज आनी भी बंद हो गई। अंटार्कटिका की बर्फीली जमीन में ऐसी दरारें बहुत हैं। अगस्त 1982 में एंब्रोस मॉर्गन, केविन ऑक्लेटन और जॉन कोल नाम के तीन रिसर्चरों ने अंटार्कटिका यात्रा शुरू की। सर्दी का मौसम शुरू हो चुका था और अंटार्कटिका के समंदर में अच्छी खासी बर्फ थी। ये तीनों आसानी से पीटरमन द्वीप पर पहुंच गए और यहां उन्होंने समंदर किनारे अपना कैंप बना लिया।

एक रेडियो ट्रांसमिशन
लेकिन दूसरे ही दिन भीषण तूफान ने सब कुछ तबाह कर दिया। गनीमत थी कि इनके पास महीने भर से ज्यादा का राशन था, जिसके सहारे उनका गुजारा चलता रहा। लेकिन बाहरी दुनिया से इनका संपर्क पूरी तरह टूट चुका था। सिर्फ एक रेडियो ट्रांसमिशन था जिसकी बैट्री धीरे-धीरे कमजोर हो रही थी। हालात बिगड़ने शुरू हो चुके थे। टीम बीमार हो गई थी। 15 अगस्त 1982 के दिन एक बार फिर तेज बर्फीले तूफान ने समुद्र की बर्फ को खत्म कर दिया और इसके बाद इन तीनों को कभी नहीं देखा गया। हालांकि इनके शव तलाशने की काफी कोशिश की गई लेकिन कामयाबी नहीं मिली। अंटार्कटिका की बर्फ में जिस किसी ने भी अपने अजीजों को खोया है उनके लिए इससे बड़ा दुख और क्या हो सकता है कि वो उन्हें आखिरी सलाम तक पेश नहीं कर पाए।
कैंप के निशान

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