वोटबैंक की राजनीति में पराली जलाने से रोकने के लिए बेअसर साबित हुआ कानून

पंजाब में किसानों को पराली जलाने से रोकने के लिए कानून बेअसर साबित हो रहा है। तमाम सख्ती के बावजूद किसान बेखौफ हो पराली जला रहे हैं। यहां तक कि कुछ बड़ी किसान यूनियनों ने तो खुलेआम एलान कर रखा है कि वे खेत में ही पराली जलाएंगे। सख्ती के नाम पर किसानों पर हर साल केस दर्ज करके जुर्माना भी किए जाता हैं लेकिन वोट बैंक पॉलिटिक्स और किसानों को विकल्प न दिए जाने के कारण वायु प्रदूषण रोकने के लिए दि एयर प्रिवेंशन एंड कंट्रोल एक्ट 1981 सही तरीके से लागू नहीं हो पा रहा है।
इस एक्ट का मकसद फैक्ट्रियों, वाहनों समेत उन तमाम चीजों पर रोक लगाना था, जिनके जरिए हवा प्रदूषित हो रही है। पिछले कुछ वर्षों से पराली जलाने से उठने वाले धुएं से वातावरण को बचाना भी इसी एक्ट के अधीन कवर होता है।
जिस हिसाब से पंजाब में पराली को जलाया जा रहा है, उस अनुपात में प्रदूषण बोर्ड ने केस दर्ज नहीं किए हैं। इसके पीछे राजनीतिक कारण हैं। साल 2016 में जिस समय पराली जलाई जा रहा थी, तो उसके छह माह बाद पंजाब में विधानसभा के चुनाव होने थे। शिरोमणि अकाली दल-भाजपा सरकार किसानों पर सख्ती का गुस्सा अपने ऊपर नहीं लेना चाहती थी। शिअद पूरी तरह से किसानी वोट बैंक पर निर्भर है, इसलिए पूरे राज्य में जमकर पराली जलाने के बावजूद मात्र 2414 केस ही दर्ज हुए।
साल 2017 में कुछ सख्ती जरूर दिखाई गई और 11005 लोगों पर केस दर्ज किए गए। ऐसा नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की ओर से की गई सख्ती के कारण हुआ, लेकिन किसान संगठनों ने भी ट्रिब्यूनल के सामने यह बात रख दी कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में पराली के प्रबंधन पर होने वाले खर्च को मूल्य एवं लागत आयोग नहीं गिनता। इस कारण किसानों पर यह अतिरिक्त भार है। किसानों की इस दलील पर सहमति व्यक्त करते हुए एनजीटी ने केंद्र व पंजाब सरकार को छोटे किसानों को निशुल्क मशीनरी उपलब्ध करवाने के आदेश दिए। उन्हें एक साल का समय दिया। इस साल किसानों को मशीनें तो दी जा रही हैं, लेकिन इसे देने में इतनी देर कर दी है कि ये समय पर उनके पास पहुंच ही नहीं पाई हैं।
पीपीसीबी की कार्रवाई
- 2016 में 2414 केस दर्ज, 6.65 लाख जुर्माना
- 2017 में 11005 केस दर्ज, 61.47 लाख रुपये जुर्माना
- 2018 में अब तक 301 केस दर्ज, 1.12 लाख जुर्माना
- -2500 रुपये से 15000 रुपये तक जुर्माने का प्रावधान
- 5000 रुपये का जुर्माना किया गया खन्ना में सेटेलाइट से केस पकडऩे के बाद
- 1981 में बनाया गया था दि एयर प्रिवेंशन एंड कंट्रोल एक्ट
- 2016 में राजनीतिक हस्तक्षेप के चलते कम केस दर्ज हुए
नहीं हो पाती जुर्माने की वसूली
पिछले दो या तीन साल से किसानों पर जितने भी केस दर्ज हुए हैं, उन पर भारी जुर्माना भी लगाया गया है। किसानों से जुर्माने की वसूली नहीं होती। यह राशि केवल उनके रेवेन्यू खाते में डाल दी जाती है। एक सीनियर अधिकारी ने कहा कि किसान ये मानकर न चलें कि अगर सरकार सख्ती से यह राशि वसूल नहीं करती है, तो वे जुर्माना अदा ही नहीं करेंगे। अगर विभाग ने यह राशि उनके रेवेन्यू अकाउंट में डाल दी और फर्द पर चढ़ गई, तो वे तब तक जमीन नहीं बेच पाएंगे, जब तक यह खाता क्लियर नहीं होता।
चुनाव नहीं लड़ पाएंगे पराली जलाने वाले
पिछले दिनों ग्रामीण विकास व पंचायती राज मंत्री तृप्त राजिंदर सिंह बाजवा ने एलान किया कि जो भी किसान अपनी पराली जलाएंगे, वे पंचायत चुनाव नहीं लड़ पाएंगे। ‘पिंड बचाओ, पंजाब बचाओ’ मुहिम के नेता डॉ. प्यारा लाल गर्ग का कहना है कि इस तरह के कानून केवल पीडि़तों को डराने के लिए ही बनाए जा रहे हैं, जबकि समस्या की जड़ के बारे में सोचने के लिए कोई तैयार नहीं है। उन्होंने कहा कि चुनाव लडऩा हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है, उसे इस तरह के कानून बनाकर सही नहीं है यदि सरकार पराली की समस्या का समाधान खुद करने को तैयार नहीं है।
किसानों को देना होगा आसान विकल्प
एग्रो इकॉनमी के एक्सपर्ट प्रो. रंजीत सिंह घुम्मण का कहना है कि वायु प्रदूषण रोकने के लिए कानून जरूर बने हैं, लेकिन जब तक हम किसानों को उनकी पराली के प्रबंधन का आसान विकल्प नहीं देते, तब तक ये उन पर कानून थोपना सही नहीं है। दस तरह न ही ये कानून काम करेंगे। पराली की समस्या कानून से नहीं बल्कि किसानों को उनकी जरूरत की मशीनरी मुहैया करवाकर हल होगी। इसके लिए मीडियम टर्म प्लान बनाने की जरूरत है।
घुम्मण का कहना है कि पराली से बायो सीएनजी और बायो मेन्योर बनाया जा सकता है। अगर सरकार प्राइवेट सेक्टर को प्रेरित करके पूरी प्रतिबद्धता से इस पर अगले पांच साल तक काम करे तो न केवल पराली की समस्या का निदान होगा, बल्कि किसानों को दो हजार रुपये प्रति एकड़ आमदनी भी मिल सकेगी। इसके अलावा जमीन को ऑर्गेनिक मेन्योर भी मिलेगा और जमीन की उपजाऊ शक्ति भी बढ़ेगी। हालांकि, उनका मानना है कि यह आसान नहीं होगा क्योंकि न तो पेट्रोलियम इंडस्ट्री चाहती है कि ऐसा हो और न ही रासायनिक खाद की इंडस्ट्री। इसलिए इस पर राजनीतिक इच्छा शक्ति दिखाते हुए आगे बढऩा होगा। अगर बायो सीएनजी और बायो मेन्योर बनाने के प्लांट लग जाएं, तो न केवल पराली बल्कि अन्य फसलों व सॉलिड वेस्ट का निपटारा भी हो सकेगा।
उपाय बहुत हैं…. पराली से बनाइए फासको कंपोस्ट
पराली से फासफो कंपोस्ट तैयार की जा सकती है। इसके लिए पराली को एक ऐसी जगह पर इकट्ठा करना होता है, जहां पानी उपलब्ध हो। कंपोस्ट बनाने के लिए पराली के दस से पंद्रह किलो के बंडल बनाने होते हैं। बड़े टैंक में प्रति हजार लीटर पानी में एक किलोग्राम गोबर का घोल तैयार करना होता है। बंडलों को इस घोल में दो तीन मिनट तक डुबोकर बाहर निकालना होता है और प्लास्टिक की तिरपाल पर इसे निकालकर रखना होता है, ताकि अतिरिक्त पानी निकल जाए। फिर पांच मीटर लंबे व डेढ़ मीटर चौड़े और छह इंच ऊंचे मिट्टी के बैंड बनाने होते हैं। बैंड पर पेड़ या कपास की टहनियों को रखा जाता है, जिससे हवा आ जा सके। इसके बाद बंडलों को खोलकर 500 किलो पराली का ढेर लगाया जाता है। इसमें रॉक फास्फेट छह प्रतिशत के हिसाब से छिड़कना होता है।
500 किलो पराली के लिए तीस किलो रॉक फास्फेट चाहिए होता है। इस तरह तैयार की गई खाद में एक फीसद फास्फोरस होता है। पराली की उपलब्धता के मुताबिक ऐसे ढेर एक एक मीटर के फासले पर लगाए जा सकते हैं। फिर ढेर को बीस से तीस सेंटीमीटर सूखी पराली से ढका जाता है, ताकि इससे 70 फीसद के करीब नमी बरकरार रहे। इसके बाद तिरछे मुंह वाली पाइप व टूल्लू पंप की सहायता से हफ्ते के बाद पानी दिया जाता है। इस तरह 80 से 90 दिन बाद कंपोस्ट तैयार हो जाती है। इसमें कार्बन व नाइट्रोजन 15-1 अनुपात में होती है।





