सोशल मीडिया के माध्यम से हर साल बचाए जा रहे है सैकड़ों वन्यजीव

जोधपुर। जहां चाह वहां राह कहावत को चरितार्थ करने में जुटे है जोधपुर के एक डॉक्टर श्रवण सिंह राठौड़। वन्यजीवों को बचाने की मुहिम में जुटे इस डॉक्टर ने मारवाड़ में घायल होने वाले वन्य जीवों को त्वरित इलाज उपलब्ध कराने को सोशल मीडिया को हथियार बनाया। उन्होंने ग्रामीणों की मदद से एक ऐसा सूचना तंत्र विकसित किया कि किसी भी वन्यजीव के घायल होने की सूचना तुरंत विभाग के अधिकारियों तक पहुंच जाती है। इसके बाद शुरू होती है उनके इलाज की प्रक्रिया। इस माध्यम से अब तक सैकड़ों वन्यजीवों को बचाया जा चुका है।पहुंचने लगे सैकड़ों घायल वन्यजीवसोशल मीडिया के माध्यम से हर साल बचाए जा रहे है सैकड़ों वन्यजीव

– दस वर्ष से वन्यजीवों के इलाज में जुटे डॉ. राठौड़ के पास पहले जानकारी के अभाव में लोग घायल वन्यजीवों को लेकर नहीं आते थे। ऐसे में उनके पास पहले साल महज पचास-साठ घायल वन्यजीव ही लाए गए।

– इसके बाद उन्होंने गांव-गांव मुहिम चलाई। इसके सकारात्मक नतीजे मिले और संख्या तीन सौ के करीब पहुंच गई। लेकिन ग्रामीण क्षेत्र से लगातार वन्यजीवों के मरने के समाचार आ रहे थे।

– तीन वर्ष पूर्व डॉ. राठौड़ ने अपना स्वयं का एक सूचना तंत्र विकसित करने का निर्णय किया। इसके बाद उन्होंने सोशल मीडिया पर वाइल्ड लाइफ रेस्क्यू ग्रुप बनाया। इस ग्रुप में जोधपुर के ग्रामीण क्षेत्र के युवाओं को बड़ी संख्या में जोड़ा। इन युवाओं में अधिकांश वन्य जीवों को बचाने के लिए तत्पर रहने वाले विश्नोई समुदाय के है।

– इसके सार्थक नतीजे मिलने लगे और लोग भी जुड़ते चले गए। यही कारण रहा कि घायल वन्यजीवों के पहुंचने की संख्या तेजी से बढ़ गई। वर्ष 2015 में 1500 व वर्ष 2016 में 1700 घायल वन्यजीव उन तक पहुंचाए गए।

– यहां लाए जाने वाले घायल वन्यजीवों में चिंकारा-ब्लैक बक के अलावा रोजड़ा, मोर व बंदर प्रमुख है। कई बार डॉ. राठौड़ स्वयं पैंथर को पकड़ कर लाते है। इन सभी वन्यजीवों को इलाज के बाद फिर से जंगल में छोड़ दिया जाता है।

– डॉ. राठौड़ का कहना है कि उनके पास लाए जाने वाले घायल वन्यजीवों की सरवाइव रेट करीब तीस फीसदी है। हालांकि यह सरवाइव रेट बेहतर मानी जाती है, लेकिन उन्होंने इसमें भी सुधार का प्रयास किया।

जोधपुर में शुरू किए सत्रह प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र

– गत वर्ष जोधपुर जिले में सत्रह स्थान पर वन्यजीवों के इलाज के साथ छोटे रेस्क्यू सेंटर विकसित किए गए। इन केन्द्रों पर राज्य सरकार के पशुपालन विभाग के पशु चिकित्सकों की मदद ली जा रही है।

– उन्होंने जिले के पच्चीस डॉक्टर, पच्चीस कंपाउंडर व पच्चीस स्वयं सेवकों को राष्ट्रीय वन्य जीव संस्थान देहरादून से विशेषज्ञों को बुलवा कर ट्रेनिंग दिलाई।

– अब ग्रामीण क्षेत्र में किसी वन्य जीव के घायल होने पर इन केन्द्रों पर उन्हें तुरंत प्राथमिक चिकित्सा उपलब्ध करवा दी जाती है। इससे सरवाइव रेट में इजाफा भी होने लगा।

वन्यजीवों को बचाने में जुटे है युवा

– जोधपुर जिले में चिंकारा व ब्लैक बक बहुतायत में पाए जाते है। इन वन्यजीवों की आबादी विश्नोई बाहुल्य गांवों में अधिक है। इस समाज के लोग अपनी जान की बाजी लगाकर भी वन्यजीवों को शिकारियों से बचाते आए है। वर्तमान में चिंकारा व ब्लैकबक का सबसे अधिक शिकार कुत्तों का समूह कर रहा है। ये चिंकारों को घेर कर उनका शिकार करने लगे है। खतरे में पड़े हिरण की आवाज सुन इस समुदाय के लोग भागे चले जाते है। और फिर सोशल मीडिया के माध्यम से वन विभाग के अधिकारियों को सूचित करने के साथ स्वयं के वाहनों से घायल वन्यजीवों को नजदीकी चिकित्सा केन्द्र लेकर पहुंच जाते है। सोशल मीडिया के माध्यम से सूचना मिलने पर वन विभाग के अधिकारी भी हरकत में आ जाते है।

ये भी पढ़ें: तो ये है डॉक्ट्रों की गंदी हैंड राइटिंग का नतीजा, जिससे लोग रहते हैं परेशान

सराहनीय प्रयास

– बरसों से वन्यजीवों के संरक्षण में जुटी संस्था विश्नोई टाइगर फोर्स के मुखिया रामपाल भवाद इसे सराहनीय प्रयास बताते है। उनका मानना है कि इस मुहिम के बाद वन्य जीवों को बचाने की दिशा में सही मायने में बेहतर काम हो रहा है। सोशल मीडिया ग्रुप से आला अधिकारी ही नहीं बल्कि वन्यजीव विशेषज्ञों के जुड़े होने से त्वरित जानकारी मिलने से घायल वन्यजीवों को तुरंत इलाज मिलना शुरू हुआ है।

Back to top button