बाड़मेर.राजस्थान के सरहदी बाड़मेर जिले में भारत-पाक बॉर्डर पर 1992 में 225 किमी. तारबंदी की गई। इस दौरान बाड़मेर के 2 हजार किसानों की 11468 बीघा खातेदारी जमीन तारबंदी और जीरो पॉइंट के बीच चली गई। करीब 25 साल से किसान अपनी जमीन के हक के लिए तरस रहे हैं। किसानों को न तो जमीन का हक मिल रहा है और न ही मुआवजा। छह फीट चौड़ी तारबंदी के नीचे आई जमीन का मुआवजा वर्ष 2004 में किसानों को दिया था, लेकिन तारबंदी से लेकर जीरो पॉइंट के बीच आई करीब 100 मीटर लंबी 11464 बीघा जमीन का मुआवजा अभी तक नहीं मिला है।

25 साल से जमीन का हक वापस पाने लड़ रहे किसान…
– भारत और पाक के बीच बॉर्डर निर्धारित होने के बाद प्रत्येक निर्धारित स्थान पर पिलर बनाए गए थे। इसके बाद सुरक्षा की दृष्टि से भारत सरकार ने 1992-93 में पीलर से भारतीय सीमा में 150 गज यानि लगभग 450 फीट दूर तारबंदी की। उस समय किसान इस जमीन पर खेती कर रहे थे। तारबंदी के समय केंद्र सरकार के रक्षा मंत्रालय एवं राज्य सरकार के राजस्व विभाग के अधिकारियों ने जमीन का अधिग्रहण कर लिया।
– पिलर और तारबंदी के बीच जिन किसानों की जमीन आ रही थी उनमें जम्मू कश्मीर, पंजाब, हरियाणा एवं राजस्थान में श्रीगंगानगर तक के किसानों को तारबंदी पर 3 से 4 किमी. पर गेट खुलवा लिए थे ताकि वे अपनी जमीन पर खेती कर सके।
– श्रीगंगानगर से आगे बीकानेर,जैसलमेर और बाड़मेर जिले के किसानों को अपनी पुश्तैनी जमीन का यह हक नहीं मिल पाया। लगातार 25 साल से तीन जिलों के किसान पुश्तैनी जमीन का हक वापस पाने की लड़ाई लड़ रहे हैं, लेकिन उन्हें अभी तक अपनी जमीन पर खेती तो दूर वहां तक जाने का भी अधिकार सुरक्षा की दृष्टि से नहीं मिल पाया है।
हाईकोर्ट गए,सरकार ने नहीं किया निर्णय
20 साल बाद 10 किसानों ने इस मामले में हाइकोर्ट की शरण ली। हाईकोर्ट ने 28 जनवरी 2013 को गृह मंत्रालय भारत सरकार, राजस्व विभाग राजस्थान सरकार, सीमा सुरक्षा बल को दो माह में किसानों की मांग पर विचार कर निर्णय लेने के लिए कहा गया। इस बात को भी 4 साल हो गए,लेकिन केंद्र व राज्य सरकार ने कोई निर्णय नहीं किया है।
3 जिले, 666 किमी. लंबा बार्डर, नहीं मिला हक
भारत-पाक अंतरराष्ट्रीय सीमा पर बसे बाड़मेर, जैसलमेर और बीकानेर जिलों की 666 किमी. लंबे बॉर्डर पर जमीन का किसानों का हक नहीं मिला है। यह जमीन तारबंदी के बाद बीएसएफ के कब्जे में चली गई और फिलहाल बीएसएफ के कब्जे में ही है।
काश्त की अनुमति दें या फिर मुआवजा दे सरकारकिसा
नों की मांग है कि तारबंदी और जीरो पॉइंट के बीच आई राजस्थान के बाड़मेर, जैसलमेर और बीकानेर समेत तीन जिलों की जमीन पर प्रत्येक 3-4 किमी. पर गेट बनाकर खेती करने की अनुमति दी जाए या फिर उस जमीन के एवज में दूसरी जगह जमीन का आवंटन किया जाए। दोनों मांगे भी नहीं माने तो सरकार बाजार भाव से जमीन का मुआवजा दें।
55 गांवों की 11465 बीघा जमीन तारबंदी में गई
सेड़वा, रामसर, चौहटन, गडरारोड तहसील के 55 गांवों की 11,465 बीघा जमीन वर्ष 1992-93 में हुई तारबंदी और जीरो लाइन के बीच चली गई। प्रशासन की ओर से हाल में तैयार की गई रिपोर्ट में डीएलसी दर से 10 करोड़ रुपए का मुआवजा इन किसानों की जमीन का बनता है।
बॉर्डर की तारबंदी और जीरो पॉइंट के बीच 100 मीटर जमीन, हक मिला सिर्फ 6 फीट जमीन का
भारत-पाक बॉर्डर तारबंदी और जीरो पॉइंट के बीच 100 मीटर जमीन आई हुई है, लेकिन किसानों को सिर्फ 6 फीट का ही हक मिला है यानि तारबंदी के नीचे आई 225 किमी. जमीन का वर्ष 2004 में बाड़मेर कलेक्टर की ओर से किसानों को भुगतान कर दिया गया। कुल 22 लाख 31 हजार 440 रुपए मुआवजा मिला था। इनमें तहसील शिव की 76.81 किमी. 2,85,450 रुपए, रामसर की 34.15 किमी. 2,25,265 रुपए, चौहटन की 114.211 किमी. 17,22,725 रुपए मुआवजा दे दिया गया। यह मुआवजा 6 फीट तारबंदी के नीचे आई जमीन का ही दिया गया। जबकि तारबंदी से जीरो पॉइंट तक करीब 100 मीटर छोड़ी जमीन राजस्थान के चार जिलों की 666 किमी. आई हुई है।
बाड़मेर एमपी कर्नल सोनाराम चौधरी के मुताबिक,नियम 377 के तहत भारत-पाक बॉर्डर पर तारबंदी के जीरो पॉइंट के बीच गई 11 हजार बीघा जमीन का मुद्दा संसद में उठाया था। पंजाब की तर्ज पर 2-3 किमी. गेट बनाकर किसानों को जमीन पर काश्त करने दी जाए या फिर इन्हें इस जमीन के बदले दूसरी सरकारी जमीन आवंटित हो या फिर बाजार दर से मुआवजा दिया जाए। 25 साल से किसान अपनी जमीन के हक की लड़ाई लड़ रहे हैं। इसको लेकर केंद्रीय गृह मंत्रालय को भी कलेक्टर की रिपोर्ट भेजी थी, उम्मीद है कि जल्द ही न्याय मिलेगा।