राजस्थान: यहां बंदूक से छलनी करते हैं रावण, 300 वर्षों से चली आ रही है ये परंपरा

प्रतापगढ़।दक्षिणी राजस्थान के आदिवासी बाहुल्य प्रतापगढ़ जिले में दशहरे पर बुराई के प्रतीक रावण को गोलियों से छलनी किया जाता है। शहर से करीब 10 किमी दूर अरनोद रोड पर स्थित खेरोट गांव में यह परंपरा पिछले तीन सौ वर्षों से चली आ रही है।
राजस्थान: यहां बंदूक से छलनी करते हैं रावण, 300 वर्षों से चली आ रही है ये परंपरा
– शनिवार को खेरोट में मिट्टी के रावण को बंदूक से छलनी करने के नजारे को देखने के लिए खेरोट सहित आसपास के गांवों से सैकड़ों लोगों की भीड़ मौजूद रही।
– पर्यावरण को होने वाले नुकसान को ध्यान में रखकर सदियों पूर्व शुरू की गई इस परंपरा के तहत दशहरे पर यहां मिट्टी का रावण तैयार कर मटके से बने सिर में लाल रंग भर दिया जाता हैं।
– गांव के कई लोग रावण के सिर को अपनी बंदूक का निशाना बनाते हैं। निकटवर्ती खेरोट गांव में वर्षों से चली आ रही परंपरा आज भी कायम है और इस बार भी दशहरे पर शनिवार को इसी परंपरा का निर्वाह किया गया।
– रावण के पुतले पर गांव के चुनिंदा लोगों ने डेढ़ सौ फीट दूर से निशाना साधकर रावण के सिर को उड़ाने का प्रयास किया।

यह है परम्परा

– गांव के कारीगर भैरु दास बैरागी ने गांव के स्कूल मैदान में मिट्टी के रावण को तैयार किया। बैरागी ने बताया कि मिट्टी के रावण का निर्माण करते हुए उसे 41 वर्ष हो गए है। रावण का धड़ हमेशा बना रहता हैं। प्रतिवर्ष उसके सिर को तैयार किया जाता हैं। सिर में रंग से भरा मटका रखा जाता है।
– गांव के रावला चौक स्थित रामजानकी मंदिर से भगवान की शोभायात्रा ढोल नगाड़ो के साथ निकलती हैं।
– जो स्कूल प्रांगण में पहुंचती है जिसके बाद राम व रावण के बीच संवाद होता है। इसके बाद तीखे भाले से रावण का नाक भेदन किया जाता है।
– पहले भगवान राम की पूजा अर्चना की जाती है। इसके बाद गांव के ठिकाने के वशंज महेन्द्र सिंह सिसोदिया द्वारा रावण के पुतले की नाक को भाले से बींधा जाता हैं।
– इसके बाद रावण के पुतले पर गोलियों की बौछार शुरू हो जाती है। जिस व्यक्ति की बंदूक से रावण का सिर को फूटता है वह इस जीत का सेहरा पहनाता है। लोग उसको कंधे पर उठाकर रावण वध की खुशियां मनाते है।

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बंदूकों से छलनी करने का यह है कारण

– गांव के बुजुर्गों ने बताया कि गांव में यह परंपरा 300 वर्षों से चली आ रही है। यहां पर रावण के पुतले का दहन नहीं किया जाता हैं तथा यह परंपरा आज भी बरकरार है। ग्रामीणों के अनुसार यहां पर रावण का पुतला बनाया जाता है।
– वहां पहले लोग फसलें काटकर ढेर लगाते थे फसल को आग नहीं लगे इसलिए रावण को जलाते नहीं है गोलियों से मारते है। क्षेत्र के लाइसेंस बन्दूक धारियों द्वारा रावण को छलनी किया गया। सुबह से ही गांव में बड़े उत्सुकता का माहौल रहता है।

नहीं मिलता बारूद

– रावण के पुतले को बंदूक से छलनी करने की खेरोट गांव की परंपरा काफी अनूठी है। कुछ वर्षों पूर्व रावण के सिर को उड़ाने के लिए लोगो में काफी होड़ लगती थी।
– दशहरे के दिन यहां 50 से 50 बंदूकधारी इकठ्टा हो जाते थे, लेकिन अब सरकार की सख्ती एवं बंदूकों के लाइसेंस कम होने के कारण बंदूकचियों की संख्या में भी कमी आई हैं।
– ग्रामीणों ने बताया कि सरकार की सख्ती से निशानचियों की संख्या में तो कमी आने के साथ ही बंदूकों में भरने वाला बारूद भी नकली मिलता है।
– जिसके कारण कई बार बंदूकें भी नहीं चल पाती हैं। रावण को प्रथम गोली लगाने वाले कि बोली लगाई जाती है।
– उसके बाद ग्रामीणों द्वारा बन्दूक की गोलियों से छलनी किया गया। यह भव्य नजारा देखने जनसैलाब मौजूद रहता है।
– खेरोट सहित आस पास क्षेत्र के कई गांवों केरवास, झांसड़ी, गंधेर, कुलथाना, बिलेसरी, खतोड़ी,आमलीखेड़ा से हजारों की तादाद में महिला पुरुष इस नजारे के साक्षी बने है।
 
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