सवाई माधोपुर.ई-मेल, व्हाट्सएेप और मैसेज के इस युग में आज भी यहां के पोस्टमैन को हर रोज 1000 लेटर और स्पीड पोस्ट एक ही एड्रेस पर ले जाना पड़ते हैं। ये पता है रणथंभौर किले में स्थित त्रिनेत्र गणेशजी टैंपल का। यहां आने वाले सभी लेटर पुजारियों को दे दिए जाते हैं और वे इन्हें भगवान गणेश के चरणों में अर्पित कर देते हैं। इसके बाद कुछ पत्र गणेशजी को दिन में दो बार पढ़कर सुनाए जाते हैं।
सालों से चली आ रही परंपरा…
– इस मंदिर में मेला शुरू हो गया है। कहते हैं कि यहां जो भी अपनी दुख बताता है उसे वे दूर करते हैं। लोग लेटर के जरिए अपनी मन्नत भी भेजते हैं जो पूरी हो जाती है।
– यहां जंगल में दुर्गम पहाड़ी पर चलकर हर रोज डाकिया कार्ड और लेटर लाता है।
– पुजारी लोगों की व्यथा और मन्नत के साथ उनके निमंत्रण को पढ़कर गणेशजी को सुनाते हैं और उनके चरणों में समर्पित कर देते हैं।
ऐसे हुई थी लेटर की शुरुआत
– कहते हैं गणेश की ये मूर्ति तराशी हुई नहीं है बल्कि खुद ब खुद एक चट्टान के रूप में मिली है। गणेश जी के तीन नेत्र हैं। भारत में ये अपने आप में अनोखा मंदिर है।
– ऐसे में मुगल काल से ही लोगों में इस मंदिर के प्रति भारी आस्था थी।
– मुगलकाल में भी लोग यहां जाकर दर्शन करते और मांगलिक कार्यों में निमंत्रण भी देते थे।
– घुड़़सवार यहां राजाओं के निमंत्रण लेकर आया करते थे।
– अंग्रेजों के जमाने में डाक व्यवस्था शुरु होने के बाद लोग घर बैठे निमंत्रण पत्र और अपनी व्यथा लेटर के जरिए भेजने लगे।
ऐसा है ये मंदिर
– यहां अक्सर बंदरों का जमावड़ा लगा रहता है। गणेश चतुर्थी पर यहां मेला परवान पर रहेगा।
– यहां पर भगवान गणेश की जो मूर्ति है, उसमें उनकी तीन आंखें हैं।
– यहां भगवान अपनी पत्नी रिद्धि और सिद्धि और अपने पुत्र शुभ-लाभ के साथ विराजित हैं।
– भगवान गणेश के वाहन मूषक (चूहा) भी मंदिर में है।
ऐसे बना ये मंदिर
– ये मंदिर 10वीं सदी में रणथंभौर के राजा हमीर ने बनवाया था।
– युद्ध के दौरान राजा के सपने में गणेशजी आए और उन्हें आशीर्वाद दिया।
– राजा की युद्ध में विजय हुई और उन्होंने किले में मंदिर का निर्माण करवाया।