83 डॉक्टरों को कोरोना संक्रमित होने का शक, प्रधानमंत्री से लगाई जान बचाने की गुहार

नई दिल्ली. कोरोना वायरस के मरीजों की संख्या भारत में बढ़ती ही जा रही है। डॉक्टर्स भी अपनी जान जोखिम पर में डार कर इनका इलाज कर रहे हैं। बिहार राज्य के पटना में एक कोरोना का मरीज पाया गया था। डॉक्टरों की जिस टीम ने उसका इलाज किया है उन सभी को अब खुद के संक्रमित होने का शक है। यहां लगभग 83 डॉक्टरों सदस्यों की टीम ने देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपनी जान बचाने की गुहार लगाई है।
यूनाइटेड रेजिडेंट नामक डॉक्टर की संस्था और डॉक्टर एसोसिएशन इंडिया ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र लिखा है। कोरोनोवायरस रोगियों का इलाज करने वाले इन डॉक्टरों और कार्यकर्ताओं ने अस्पताल से जुड़े मुद्दों पर पीएम से “तत्काल हस्तक्षेप” करने की मांग की है। पत्र में दावा किया गया है कि पटना के नालंदा मेडिकल कॉलेज के 83 से ज्यादा स्थानीय डॉक्टर कोरोना मरीज के संपर्क में आए थे। इन्होंने कोरोनो के उस मरीज का टेस्ट किया था और वो पॉजिटिव निकला।
इसके बाद से सभी डॉक्टर्स घबराए हुए हैं उन्हें खुद के भी कोरोना संक्रमित होने की आशंका है। पत्र पर URDA के अध्यक्ष डॉ. मनु गौतम ने हस्ताक्षर किए हैं। डॉ. गौतम ने मीडिया को बताया कि, “एक मरीज था जिसे पटना के नालंदा मेडिकल कॉलेज में लाया गया था। सामान्य इलाज के एक हफ्ते बाद वो कोरोना वायरस से संक्रमित निकला था। उसकी रिपोर्ट पॉजिटिव आई थी।
उस समय कई निवासी और डॉक्टर्स उसके संपर्क में आए क्योंकि तब उसके कोरोना रोगी होने का किसी को पता नहीं था। यहां असप्ताल स्वास्थ्य कर्मियों द्वारा ये एक बड़ी गड़बड़ की है।”
उन्होंने कहा, “बाद में उनमें से ज्यादातर में कोरोना के लक्षण दिखना शुरू हो गए हैं जिसके बाद सभी 83 डॉक्टर प्रशासन से अनुरोध करने लगे कि क्या वे खुद को क्वारंटाइन कर सकते हैं। प्रसाशन ने डॉक्टरों को आइसोलेशन या क्वारंटाइन में जाने की परमिशन देने से इनकार कर दिया था।
गौतम ने आरोप लगाया कि डॉक्टरों का न तो अब तक परीक्षण किया गया है, न ही उन्हें ड्यूटी से हटाकर सेल्फ आइसोलेशन में रहने को कहा गया है। इसलिए सभी ने पीएम को पत्र लिखकर विनती की है। नालंदा मेडिकल कॉलेज में अधीक्षक और अस्पताल प्रबंधक ने इस बारे में कोई टिप्पणी नहीं दी। डॉक्टरों की शिकायत के अनुासार, डॉक्टरों और नर्सों को पर्याप्त मास्क, दस्ताने, सैनिटाइटर और अन्य व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण नहीं दिए जा रहे हैं। यह दावा करता है कि “स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को उपकरणों के बिना काम करने के लिए कहना एक सैनिक को बंदूक के बिना लड़ाई के लिए सीमा पर जाने के लिए कहने जैसा है।”

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