13 जनवरी को मनाई जाएगी लोहड़ी

कई स्थानों पर लोहड़ी (Lohri 2026) को लाल लोई भी कहा जाता है, जो मकर संक्रांति से एक दिन पहले मनाया जाता है। इस दिन अलाव जलाकर उसमें नए गेहूं और जौ की बालियां अर्पित की जाती है। साथ ही पारंपरिक गीत गाए जाते हैं व नृत्य किया जाता है। लोग एक-दूसरे को लोहड़ी की बधाई देते हैं और ईश्वर को अच्छी फसल के लिए आभार प्रकट करते हैं।

लोहड़ी संक्रांति का क्षण (Lohri Sankranti Moment)
लोहड़ी (Lohri 2026) पर संक्रांति का क्षण बुधवार 14 जनवरी प्रातः 3 बजकर 13 मिनट तक रहने वाला है। ऐसे में मकर संक्रांति 14 जनवरी को मनाई जाएगी।

लोहड़ी पर्व का महत्व (Lohri Significance)
लोहड़ी का त्योहार पर्व केवल फसलों से संबंधित नहीं है, बल्कि यह दिन लंबे होने की शुरुआत का भी प्रतीक होता है। यह वह समय है, जब किसान अपनी अच्छी फसल के लिए प्रकृति को धन्यवाद देते हैं और जश्न मनाते हैं। इस पर्व के साथ ही आने वाले साल में खुशहाली के लिए प्रार्थना भी की जाती है।

लोहड़ी के विशेष अवसर पर लोग आंगन या खुले चौक में पारंपरिक रूप से अलाव जलाते हैं और भांगड़ा व गिद्दा जैसे पारंपरिक नृत्य करते हैं। आभार के प्रतीक के रूप में आग में अनाज, मिठाइयां, मूंगफली, पॉपकॉर्न जैसी चीजें चढ़ाई जाती हैं। इस दिन सरसों का साग, मक्के के आटे की रोटी, गजक और रेवड़ी जैसे पारंपरिक पकवानों का आनंद लिया जाता है।

लोहड़ी से जुड़ी कहानी
लोहड़ी को लेकर अपनी बहादुरी के लिए मशहूर लोक नायक दुल्ला भट्टी (Dulla Bhatti) की कहानी प्रसिद्ध है। लोहड़ी के पारम्परिक गीतों दुल्ला भट्टी का जिक्र भी आता है। इस कहानी के अनुसार, एक समय में मुगल राजा अकबर के काल में दुल्ला भट्टी नामक एक लुटेरा पंजाब में रहता था। वह धनी लोगों को लूटकर उसने मिले सभी धन को गरीब की मदद में लगा देता था। दुल्ला भट्टी पंजाब के रॉबिन हुड नाम से भी प्रसिद्ध है।

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