सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला

डॉ गोपाल कृष्ण
आधार की अनिवार्यता को लेकर देश में एक अरसे से बहस चलती रही है कि आधार योजना नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है, इसलिए इसको रोक दिया जाये। एक तरफ सरकारें अपने-अपने तर्कों से आधार की अनिवार्यता को मजबूती देती रही हैं, तो वहीं दूसरी तरफ इसकी हकीकत को समझने वाले विशेषज्ञ इसके खिलाफ खड़े होते रहे हैं। बहस चलती रही और कई बार सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि आधार को अनिवार्य नहीं किया जा सकता है।
इसी बहस में यह भी आया कि चूंकि निजता पूरी तरह से परिभाषित नहीं है, इसलिए निजता व्यक्ति का मौलिक अधिकार नहीं है। लेकिन, अब सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह स्पष्ट कर दिया है कि निजता एक मौलिक अधिकार है।
दरअसल, व्यक्ति की निजता के अधिकार को लेकर आधार परियोजना को लागू करने का सरकार का मूल तर्क यह था कि संविधान के अंतर्गत निजता मौलिक अधिकार नहीं है। सरकार के इस मूल तर्क को सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों की संविधान पीठ ने खारिज कर दिया है और अपने फैसले में कहा है कि निजता का अधिकार व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। इस फैसले के बाद अब आधार परियोजना और आधार कानून-2016, इन दोनों के ऊपर तलवार लटक रही है और सरकार की मुश्किल बढऩे वाली है। इस फैसले से यह भी पूरी तरह से स्पष्ट हो गया है कि आधार परियोजना और आधार कानून दोनों ही काले कानून हैं, इस अर्थ में कि ये दोनों ही व्यक्ति के मौलिक अिधकारों का उल्लंघन करते हैं। सुप्रीम कोर्ट का आदेश बिल्कुल स्पष्ट करता है कि निजता का अधिकार गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार का हिस्सा है।
सुप्रीम कोर्ट इस मामले की सुनवाई 2012 से ही कर रहा है। सितंबर 2013 से लेकर जून 2017 तक के अपने हर फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट निर्णय दिया है कि आधार को अनिवार्य नहीं किया जा सकता है। निजता को मौलिक अधिकार माननेवाला कल जो फैसला आया है और इसके पहले आधार की अनिवार्यता को खारिज करने वाले जो फैसले आये, इन सभी फैसलों को अगर साथ-साथ पढ़ा जाये, तो यह साफ हो जाता है कि आधार परियोजना और आधार कानून किसी भी सूरत में संविधान सम्मत नहीं हैं। ये मौलिक अधिकारों और संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं। संविधान पीठ ने बिल्कुल ही यह स्पष्ट कर दिया है कि पिछले चार दशकों से सुप्रीम कोर्ट लगातार यह फैसला देता रहा है कि निजता का अधिकार एक मौलिक अधिकार है। हम सभी नागरिकों को ये अधिकार संविधान से मिले हुए हैं।
सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों में से छह जजों ने ये फैसले लिखे हैं और उन्होंने स्पष्ट किया है कि कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार नागरिकों के मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं किया जा सकता है। यहां दूसरी बात बहुत ही महत्वपूर्ण है। वह यह है कि आधार एक्ट में यह प्रावधान है कि किसी भी व्यक्ति का आधार नंबर बिना उससे पूछे हुए निष्क्रिय (डीएक्टिवेट) किया जा सकता है। इसका मतलब यह हुआ कि आधार परियोजना किसी भी भारतीय नागरिक का ‘सिविल डेथ’ कर सकती है, यािन सरकारी रिकॉर्ड में किसी को भी मृत घोषित किया जा सकता है। अभी पिछले दिनों एक खबर आयी थी कि पचास लाख लोगों का आधार निष्क्रिय कर दिया गया है और उन्हें बताया भी नहीं गया है कि उनका आधार निष्क्रिय कर दिया गया है, तो क्यों कर दिया गया है। सरकार के इस तरह के निर्णय और इस प्रकार की परियोजना को सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के फैसले ने सवालों के घेरे में ला दिया है। अब सुप्रीम कोर्ट की एक और बेंच बैठेगी और यह निर्णय करेगी कि आधार परियोजना और आधार कानून, इन दोनों के जरिये व्यक्ति की निजता का कैसे उल्लंघन होता है। उस आने वाले दिन का हमें इंतजार रहेगा, जब बेंच का आगामी फैसला नागरिकों की निजता के अधिकार की रक्षा करने वाला होगा।
गौरतलब बात यह भी है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का दुनिया के बहुत सारे देशों ने स्वागत किया है। इसके पहले भी बहुत सारे देशों में ऐसे ही निर्णय लिये गये हैं। जैसे कि अमेरिका में, ब्रिटेन में, फ्रांस में, जर्मनी में, ऑस्ट्रेलिया में, फिलीपींस में और चीन में, आधार जैसी परियोजना को रोक दिया गया है, यह कहते हुए कि यह योजना व्यक्ति की निजता का और नागरिकों के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करती है।
आधार परियोजना यानी आधार संख्या यानी एक विशिष्ट पहचान संख्या होती है। यह बहुत ही संवेदनशील और निजी जानकारियों के आधार पर बनी योजना है। हालांकि, विशिष्ट पहचान संख्या 12 अंकों की होती है, लेकिन मूलत: वह 16 अंकों की होती है, जिसमें चार अंक छुपे हुए होते हैं। ये संख्याएं उंगलियों के आधार पर, आंखों की पुतलियों के आधार पर बनी हुई होती हैं। सरकारों ने बहुत से प्रचार माध्यमों के जरिये नागरिकों को मजबूर किया है कि वे आधार कार्ड बनवायें।
सुप्रीम कोर्ट के बीते नौ जून के फैसले और फिर दोबारा 27 जून को आये उसके फैसले में यह स्पष्ट किया गया है कि आधार अनिवार्य नहीं है। और कल आया फैसला भी यही स्पष्ट करता है कि आधार अनिवार्य भी नहीं है और संविधान सम्मत भी नहीं है। इसलिए केंद्र सरकार और राज्य सरकारों द्वारा, तमाम सरकारी संस्थाओं और बैंकों द्वारा, तमाम एजेंसियों और मोबाइल कंपनियों के द्वारा, यूजीसी और कुछ विश्वविद्यालयों द्वारा जिस तरह से आधार को अनिवार्य बनाया गया है, इन सब पर अब सवालिया निशान लग गया है। केंद्र और राज्य सरकारों और संबंधित सभी विभागों और संस्थाओं के लिए अब इस फैसले को संज्ञान में लेकर आधार को अनिवार्य बनाने के अपने सर्कुलर को वापस लेने की मजबूरी बन गयी है। उम्मीद यही की जा सकती है कि इस फैसले के बाद सरकार पर दबाव बनेगा और वह अपने नागिरकों की निजता के अधिकार की रक्षा का ख्याल रखेगी।





