सहारे और संघर्ष की दास्तान है एमबीए नेहा की चाय की दुकान, जानिए इनकी अनोखी कहानी

यूं ही नहीं कहा जाता है कि बेटियां बेटों से कम नहीं। हर खुशी और दुख की घड़ी में परिवार का संबल होती हैं बेटियां। उत्तराखंड के रुद्रपुर की नेहा मखीजा भी ऐसा ही एक नाम है। 18 वर्ष पूर्व जब पिता का साया सिर से उठा, तब सात साल की ही थी। मां ने परिवार का पालन-पोषण करने के लिए कपड़ों की सिलाई का काम शुरू किया। 
नेहा बड़ी हुई तो उसने खुद पैरों पर खड़े होने और मां का सहारा बनने के लिए कदम बढ़ाए। एमबीए की पढ़ाई के साथ-साथ रुद्रपुर रेलवे स्टेशन के समीप छोटी की चाय की दुकान चलाई। यही नहीं एमबीए पास करने के बाद कई जगह नौकरी भी की। आखिर में अहमियत अपनी ही चाय की दुकान को दी। नेहा कहती हैं, यह भी तो अपने पैरों पर खड़ा होना ही है।
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रुद्रपुर रेलवे स्टेशन के सामने छोटी सी चाय की दुकान चला रही एमबीए पास नेहा मखीजा युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत बन गई है। बकौल नेहा, पिता राजेंद्र कुमार की साल 2000 में सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी। परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। मां सरोज पर तीन बेटियों की परवरिश का जिम्मा आ गया। बड़ी बहन सारिका व सबसे छोटी गार्गी भी मां को सहारा देने लायक नहीं थी। इसी बीच मां ने घर के सामने ही बाउंड्री से सटाकर चाय की दुकान खोल ली। यहां वह कपड़ों की सिलाई का काम भी ले लेती थी। फिर मैंने स्कूल की पढ़ाई के दौरान कुछ समय दुकान में बैठकर मां का हाथ बंटाना शुरू किया।





