सप्ताह की नौटंकी : बतकहियों के लच्छे

 
 
 
 
उर्मिल कुमार थपलियाल
नट— अरी मेरी नटखटी चटपटी नटी। क्या बात है। आज बहुत खुश हो।
नटी— क्यूं तो क्या केजरीवाल की तरह मुंह लटकाये रहूं।
नट— नहीं..नहीं खुश रहो, आबाद रहो, चाहे यहां रहो या पुराने फैजाबाद रहो।
नटी— पुराना फैजाबाद यानि आज की अयोध्या।
नट— अरी अयोध्या तो राम की है री।
नटी— राम भी तो हमारे हैं।
नट— कभी लोहियावादियों के थे। रामायण मेलों की शुरुआत भी उन्होंने ही की थी।
नटी— और क्या। जय भीम का नारा भी तो महाभारत से तिड़ी किया गया है।
नट— मगर हुआ क्या। रामराज तो आया नहीं।
नटी— अरे जो गन्ने का बकाया न दे। चीनी मिल उसी को तो कहते हैं।
नट— बिल्कुल यही। चुनाव के दौरान जो मूर्ख नहीं बनते वो समय और अवसर दोनों गवां देते हैं।
नटी— हां, शुभ मुहूरत निकल जाने के बाद पंडित क्यूं नहीं बदला जा सकता।
नट— वाकई सही है। जिनके घर भगवान की मूर्ति नहीं मिलती वो सिलबट्टे से काम चला लेते हैं।
नटी— दारू अगर चरणामृत की तरह पियो तो सुना पुण्य मिटता है।
नट— मैं तो पूरी बोतल ही मुंह से लगा लेता हूं। सीधे गोमुख गंगोत्री जाओ। हरिद्वार में वो क्या धरा है।
नटी— अरे अब तो त्योहारों के दिन आ रहे हैं।
नट— मगर त्योहार तो अब सिर्फ कलेन्डर पर भले लगते हैं।
नटी— हां भई, दशहरे के दिन भी राम को कई गज की दूरी से रावण को मारना पड़ेगा।
नट— त्योहारों के बाजार तो अभी से लगने लगे हैं।
नटी— दीन ईमान की ढेरियां बिकाऊ हैं
नट— बिग बाजारों का हाल ये है कि कही महंगाई मुंह नहीं दिखा पा रही है।
नटी— मस्ती बड़ी सस्ती हो गयी है।
नट— मंत्री पद देखकर जिस नेता की लार न टपके।
नटी— समझो लाइलाज है।
नट— और इच्छामृत्यु चाहने लगा है।
नटी— वाह, वाह से तो वही बात हुई कि बहू की गोदभराई तो हो गयी।
नट— पर प्रेगनेन्सी टेस्ट अभी बाकी है।
नटी— हे नट, मैं तेरे मुंह में रखा बताशा हूं तो
नट— मैं खट्टा मीठा जलजीरा हूं यार।
(नक्कारा फटे हुए दूध की तरह बजाता है।)
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