शीतल देवी बनीं दुनिया की सर्वश्रेष्ठ पैरा तीरंदाज, ‘पैरा आर्चर ऑफ द ईयर’ के लिए नामित’

शीतल देवी की कहानी केवल खेलों में जीत की नहीं बल्कि नामुमकिन को मुमकिन कर दिखाने के अटूट साहस की दास्तां है। किश्तवाड़ की पहाड़ियों से निकलकर दुनिया के शिखर तक पहुंचने वाली शीतल का विश्व आर्चरी की ओर से पैरा आर्चर ऑफ द ईयर 2025 के लिए नामित किया जाना पूरे जम्मू-कश्मीर के लिए गर्व का क्षण है।
इस उपलब्धि से वह करोड़ों युवाओं के लिए प्रेरणा की अब और मजबूत मिसाल बन गई हैं। किश्तवाड़ के लोई धार जैसे सुदूर गांव से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर तिरंगा फहराना शीतल के कठिन परिश्रम का प्रमाण है। जन्म से ही दोनों हाथ न होने के बावजूद उन्होंने अपने हौसले, मेहनत और जज्बे से ये नया मुकाम हासिल किया है। शीतल का बचपन चुनौतियों से भरा रहा है। पिता मान सिंह साधारण परिवार से हैं। मां शक्ति देवी ने शीतल का हमेशा हौसला बढ़ाया।
कटड़ा स्थित श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड के स्पोर्ट्स स्टेडियम में आर्चरी अकादमी में दाखिला लेने के बाद उनके जीवन ने नया मोड़ लिया। शुरुआत में हालात बेहद कठिन थे। वह धनुष तक नहीं उठा पाती थीं, निशाना चूक जाता था और कई बार निराशा भी हाथ लगती थी। उनके कोच कुलदीप वेदवान और अभिलाषा चौधरी ने उन्हें हिम्मत दी और लगातार प्रेरित किया।
शीतल ने अपने दाएं पैर से धनुष उठाने और मुंह व कंधे की मदद से तीर चलाने का अभ्यास शुरू किया। शुरुआती दिनों में यह बेहद कठिन था लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। ट्रेनिंग के दौरान उनके लिए विशेष धनुष तैयार किया गया जिससे वह बेहतर अभ्यास कर सकें।
दो साल की कड़ी मेहनत के बाद उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया और राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार पदक जीतने शुरू किए। वर्ष 2021 में उन्होंने अपने कॅरिअर की शुरुआत की और पहली बार किश्तवाड़ में भारतीय सेना की एक प्रतियोगिता में भाग लिया।
हिम्मत और परिवार के साथ की जरूरत
शीतल देवी का कहना है कि उनके जैसे कई बच्चे होंगे जिन्हें सिर्फ हिम्मत और परिवार के साथ की जरूरत है। अगर वे खेल को अपनाएं तो वे भी देश का नाम रोशन कर सकते हैं। उनकी कहानी यह साबित करती है कि हालात चाहे कितने भी कठिन क्यों न हों अगर इरादे मजबूत हों तो सफलता जरूर मिलती है।





