शादी के बाद कैसे मैनेज करें खर्च और सेविंग्स?

शादी न केवल दो दिलों का मिलन है, बल्कि इसके बाद दो अलग-अलग व्यक्तित्व और जिंदगियों का भी मेल होता है। ऐसे में अक्सर कपल्स को शुरुआत में तालमेल बैठाने में परेशानी का सामना करना पड़ता है, खासकर फाइनेंशियल मामलों में।

जी हां, कपल्स अक्सर शादी से पहले पैसों के बारे में बात करना भूल जाते हैं या समझते हैं कि यह डिसकस करने का मामला नहीं है। लेकिन बाद में यह समस्या बन सकती है। पैसों को कैसे खर्च करना है, कहां खर्च करना है, कौन कितना योगदान देगा जैसे सवाल बाद में झगड़े की वजह बन सकते हैं। इसलिए जरूरी है कि शादी के बाद आप पैसे कैसे मैनेज (Financial Planning For Couples) करेंगे इस बारे में अपने पार्टनर से बात कर लें। आइए जानें इसके लिए कुछ असरदार टिप्स।

फाइनेंशियल ट्रांसपेरेंसी है सबसे जरूरी
पैसे के मामले में ईमानदारी रिश्ते की नींव होती है। अपने पार्टनर के साथ बैठकर अपने कर्ज, सेविंग्स, इंवेस्टमेंट और खर्च करने की आदतों पर खुलकर चर्चा करें। एक-दूसरे से अपनी सैलरी या बकाया क्रेडिट कार्ड बिल न छुपाएं। जब दोनों को पता होगा कि घर में कुल कितनी इनकम और खर्च है, तभी मिलकर प्लान बनाना संभव होगा।

शेयर्ड और पर्सनल गोल्स तय करें
आप दोनों को मिलकर यह तय करना चाहिए कि आप अगले 5 या 10 सालों में खुद को कहां देखते हैं। साझा लक्ष्य में घर खरीदना, बच्चों की पढ़ाई या वेकेशन प्लानिंग हो सकती है। व्यक्तिगत लक्ष्य में किसी को कोई महंगा गैजेट खरीदना हो सकता है या अपने माता-पिता की मदद करनी हो सकती है। इन लक्ष्यों को प्राथमिकता दें, ताकि बचत उसी दिशा में हो सके।

‘तुम्हारा-मेरा’ के बजाय ‘हमारा’ बजट बनाएं
एक बजट बनाना यह सुनिश्चित करता है कि आपके खर्च आपकी कमाई से ज्यादा न हों। खर्चों को तीन कैटेगोरी में बांटें-

फिक्स खर्च- किराया, बिजली बिल, राशन और EMI।
सेविंग और इंवेस्टमें- म्यूचुअल फंड, FD या रिटायरमेंट फंड।
अन्य खर्च- बाहर खाना, शॉपिंग और मनोरंजन।

बैंक अकाउंट्स का सही मैनेजमेंट
इसके लिए आप दो तरह के बैंक अकाउंट खुलवा सकते हैं-

जॉइंट अकाउंट- घर के खर्चों और साझा निवेश के लिए एक जॉइंट अकाउंट रखें। इसमें दोनों पार्टनर एक निश्चित राशि हर महीने डालें।
सेपरेट अकाउंट- अपनी व्यक्तिगत जरूरतों और इंडिपेंडेंस के लिए अपने पर्सनल अकाउंट जारी रखें।

इमरजेंसी फंड और इंश्योरेंस
अनचाही परिस्थितियों के लिए कम से कम 6 महीने के खर्च के बराबर इमरजेंसी फंड जरूर बनाएं। इसके साथ ही, टर्म इंश्योरेंस और हेल्थ इंश्योरेंस लेना न भूलें। यह न केवल वित्तीय सुरक्षा देता है, बल्कि मानसिक शांति के लिए भी जरूरी है।

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