शरद पवार का दलबदल विरोधी कानून वाला बयान बढ़ा सकता है फडणवीस सरकार की मुश्किलें….

महाराष्ट्र में बेहद नाटकीय घटनाक्रम के बीच आखिरकार भाजपा के देवेंद्र फडणवीस ने एक बार फिर मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली है। सरकार बनाने में उनका सहयोग करने वाले एनसीपी के नेता अजीत पवार ने भी शनिवार सुबह फडणवीस के साथ ही उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली है। इसके साथ ही महाराष्ट्र में राजनीतिक बवंडर मचा हुआ है। एनसीपी चीफ शरद पवार इसे भतीजे का धोखा बता हुए दावा कर रहे हैं कि पार्टी विधायक उनके साथ हैं। इतना ही नहीं उन्होंने भाजपा सरकार का समर्थन करने वाले अजीत पवार व अन्य विधायकों को दलबदल विरोधी कानून का सामना करने की भी चेतावनी दी है। आइये जानते हैं क्या है ये कानून और इसके प्रावधान।
दलबदल कानून का अर्थ
दलबदल का शाब्दिक अर्थ है, एक दल से दूसरे दल में जाना। 1960-70 के दौरान ऐसे कई मामले सामने आए, जब किसी नेता ने एक ही दिन में दो दल बदल दिये। सबसे दिलचस्प वाकया 30 अक्टूबर 1967 को हुआ। हरियाणा के एक विधायक गया लाल ने एक ही दिन में दो बार और 15 दिन में तीन बार दल बदल दिया। उन्होंने 15 दिन में कांग्रेस और जनता दल दो-दो चक्कर लगा दिए थे। इस राजनीतिक उछलकूद पर लगाम लगाने के लिए एक मार्च 1985 को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने ये कानून लागू कर दिया।
विधायकों की अयोग्यता का आधार
– किसी विधायक का एक दल के टिकट से चुनाव लड़ना और जीतने के बाद किसी दूसरे दल में शामिल हो जाना।
– मौलिक सिद्धांतों पर विधायक या सांसद का अपनी पार्टी की नितियों के खिलाफ जाकर सदन में वोट करना या नीति विरुद्ध योगदान करना।
– चुनाव जीतने के बाद अपने दल को छोड़कर विधायक का निर्दलीय रहना।
– दलबदल तब माना जाता है, जब किसी दल का सांसद या विधायक अपनी मर्जी से पार्टी छोड़ता है या पार्टी व्हिप की अव्हेलना करता है।
– दलबदल साबित होने पर संबंधित सांसद या विधायकों की सदस्यता समाप्त की जा सकती है। साथ ही दलबदल कानून के तहत कार्रवाई भी हो सकती है।
ऐसे में लागू नहीं होता दलबदल कानून
– किसी विधायक या सांसद को पार्टी से निकाले जाने पर उसकी सदस्यता खत्म नहीं होती।
– पार्टी से निकाला जाना दलबदल कानून के अंतर्गत नहीं आता है।
– यदि किसी पार्टी के दो तिहाई विधायक या सांसद एक साथ पार्टी छोड़ दें तो भी ये कानून लागू नहीं होता है।
– पहले एक साथ पार्टी छोड़ने वाले सदस्यों की संख्या एक तिहाई ही निर्धारित थी।
– पार्टी से अलग होने वाले दो तिहाई सदस्य अलग दल नहीं बना सकते। उन्हें किसी दूसरे दल में ही शामिल होना होगा।
क्लाइमेक्स अभी बाकी है
दलबदल कानून और उसकी शर्तों को देखें तो भाजपा को समर्थन देने का अजीत पवार का फैसला तभी सही साबित हो सकता है, जब उनके पास दो-तिहाई विधायकों का समर्थन होगा। विधानसभा चुनाव 2019 में एनसीपी को कुल 54 सीटें मिली हैं। इस तरह से पार्टी के खिलाफ जाकर भाजपा को समर्थन करने के लिए अजीत पवार को कम से कम दो तिहाई मतलब 36 विधायकों का साथ चाहिए। अगर वह इसमें नाकाम होते हैं, तो जैसा कि एनसीपी शरद पवार ने चेतावनी दी है उन्हें और उनके साथ आने वाले विधायकों को दलबदल कानून का सामना करना पड़ सकता है। इससे अजीत पवार की तो मुश्किलें बढ़ेंगी ही, भाजपा की नई सरकार के लिए भी संकट खड़ा हो सकता है। यही इस पूरी फिल्म का असली क्लाइमेक्स होगा।

जानें- एनपीसी विधायकों ने क्या कहा
शरद पवार के दावे को उनकी पार्टी के विधायकों ने मजबूती दी है। शनिवार दोपहर 12:30 बजे एनसीपी चीफ शरद पवार ने शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के साथ प्रेसवार्ता में कहा, ‘अजीत पवार का फैसला अनुशासनहीनता है। कोई भी रांकापा कार्यकर्ता फडणवीस सरकार को समर्थन नहीं देगा।’ इसी प्रेस कॉफ्रेंस में मौजूद एनसीपी के कुछ विधायकों ने बताया कि उन्हें शनिवार सुबह अचानक राजभवन बुला लिया गया। उन्हें कुछ नहीं पता था वहां क्या होने वाला है। उन्हें इस बात का अंदाजा भी नहीं था कि वहां शपथ ग्रहण समारोह होने वाला है। वह खुद शपथ ग्रहण देखकर हैरान हो गए। एनसीपी विधायकों का ये बयान अजीत पवार और भाजपा की मुश्किलें बढ़ाने के लिए काफी है।





