विज्ञान और विकास पर आधारित नाटकीय लेकिन वास्तविक विनाश – चक्र
डॉ अमिताभ शुक्ल
यदि, आपने हॉरर मूवी देखी हैं और फिक्शन पर आधारित ऐसी मूवी देखी हैं, जिनमें भविष्य में वैज्ञानिक प्रगति पर आधारित मानव और मशीनों के द्वारा असंख्य लोगों पर नियंत्रण स्थापित किया जाता है, तब आप इस ” अविश्वसनीय घटनाक्रम ” की पृष्ठभूमि में रचित उस घटनाक्रम की कल्पना कर सकते हैं , जिसके आधार पर संपूर्ण विश्व में एक “नियोजित ढंग से तैयार किए गए मॉडल” पर सारी गतिविधियां संचालित हो रही हैं। यह वर्तमान समय में संचालित हो रही समस्त क्रियाएं हैं – कोविड- 19 , मास्क, सोशल – डिस्टेंसिंग , वायरस , वेंटिलेटर , ” वर्चुअल विश्व” , जिसमें शिक्षा, स्वास्थ्य , प्रशासन , राजनीति, शोध संगोष्ठी , विचार विमर्श सहित पारस्परिक – संवाद भी “ऑनलाइन “किए जाने की व्यवस्था शामिल है। इसकी पृष्ठभूमि में वही रचना है , जिसमें पात्रों की भूमिका विश्व की 5 बिलियन से अधिक जनसंख्या निभा रही है। विश्व में दवाओं और चिकित्सकीय उपकरणों की बिक्री और ऑनलाइन गतिविधियों के व्यापार में कई सौ गुना की वृद्धि हो चुकी है और यह व्यापार कई वर्षों तक जारी रहेगा।
अमानवीयता का विकास और मानवीयता का ह्रास
अमानवीय तरीकों से अकूत लाभ और सामरिक रचनाओं से विश्व को चंगुल में लेने के उद्देश्य प्राप्त करने में भारी सफलता प्राप्त होकर मानव और मानवीय सभ्यता की विफलता स्थापित हो चुकी है। महात्मा गांधी ने बहुत पहले कहा था कि, ” उन्माद विकृति का प्रतीक है और विकृति का सामना संस्कृति ही कर सकती है।
यद्यपि , वर्तमान व्यूह – रचना में संस्कृतियां पहले ही ध्वस्त हो चुकी हैं और मानवीय सभ्यता अपने पतन पर तो बहुत पहले पहुंच चुकी है। 1980 के दशक में अमेरिका में घटित ” ब्लैक मंडे ,” इसका एक उदाहरण है , जब एक रात बिजली के जाने पर विश्व के अत्यंत विकसित देश माने जाने वाले अमेरिका में न्यूयॉर्क में लूट , बलात्कार , डकैती का भीषण नजारा सामने आया था। भारत जैसे विश्व के आध्यात्मिक और धार्मिक दृष्टि से संपन्न माने जाने वाले देश में जो सब घटित हो रहा है, जिसमें कोई सीमा शेष नहीं रह गई है . भ्रष्टाचार का चरम , मानवीय मूल्यों का ह्रास और बलात्कार आम घटनाएं हो जाने के बाद भी क्या भारत को सांस्कृतिक और मानवीय दृष्टि से संपन्न राष्ट्र कहने की धूर्तता और ध्रष्टता को स्वीकार किया जाना चाहिए ?
अंततः , जैसा कि , उपरोक्त पंक्तियों में शोध , सूचनाओं और विश्लेषण के आधार पर व्याख्या की गई है, आज विश्व और भारत जिस स्थिति में पहुंच गया है , यही मानवीयता और संस्कृति का रसातल में जाना है। जैसा कि , अनुमान था , 20 लाख करोड़ रुपए से इस मानवीय त्रासदी में राहत के कार्यों के लिए आवंटित राशि से भ्रष्टाचार की खबरों का आना प्रारंभ हो चुका है। क्वारंटाइन सेंटरों के क्रियाकलापों में भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अक्षमताओं के उदाहरण भी अखबारों की सुर्खियों में हैं।
विश्व में और भारत में करोड़ों लोगों की बेरोजगारी और गरीबी में वृद्धि , अभाव का जीवन और मृत्यु इस घटनाक्रम का एक सामान्य सोपान है. . ” समृद्धि की इमारतें सदैव शोषण पर आधारित होती हैं ” , इसलिए न तो विश्व के प्रमुख देशों की सरकारें जो स्वयं कठपुतली बन चुकी हैं , ” विकास के वैकल्पिक प्राडर्स” पर विचार करने की स्थिति में हैं और न जनता , जो कि इन सारे घटनाक्रमों की जो पिछले 50 साल के विकास पर आधारित हैं के स्थान पर जीवन और विकास के विकल्प पर चल पाने की स्थिति में हैं।
भारत में कृषि आधारित अर्थव्यवस्था का ध्वस्त हो जाना- मध्य प्रदेश , उत्तर प्रदेश , पंजाब जैसे कृषि से संपन्न राज्यों में कृषि भूमि से आजीविका कमाने वालों की दुर्दशा और छत्तीसगढ़ , मध्य प्रदेश , उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में हजारों लाखों एकड़ जमीन को मुफ्त में या न्यूनतम शुल्क पर कॉरपोरेट हाउसों को दिया जाना राज्य सरकारों की पूंजीपतियों से गठजोड़ के उदाहरण हैं।
मध्य प्रदेश जैसे राज्य में कृषि और कृषि पर आधारित उद्योगों के विकास के द्वारा ” विकास का एक सुंदर ढांचा ” तैयार हो सकता था , लेकिन , पूंजीवादी उपकरणों के द्वारा संचालित सरकारों के द्वारा वह खेल जारी हैं , जो गरीबों के मुंह का निवाला और शिक्षित नौजवानों के रोजगार छीन कर कारपोरेट हाउसियो के व्यापार और लाभ में अकूत वृद्धि करने का कार्य कर रही हैं , और विश्लेषक भी तमाशा देखने के लिए विवश हैं ….!!!!
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