विकास दुबे तो मारा गया लेकिन एक सवाल कभी नहीं मर सकता

यशोदा श्रीवास्तव, नेपाल मामलों के विशेषज्ञ—यशोदा श्रीवास्तव , वरिष्ठ पत्रकार
लखनऊ : कानपुर में आठ आठ पुलिस जनों की हत्या के दोषी विकास दूबे के दीर्घायु की कामना कोई नहीं कर रहा था।सभी चाहते थे कि ऐसे दुर्दांत का अंत ऐसा हो कि जरायम की दुनिया कांप उठे। अफसोस! कि ऐसा नहीं हुआ। उसे वही मौत मिली जो अबतक इस सरीखे अपराधियों को मिलती रही या जैसा कि वे कल्पना करते हैं।विकास दूबे को इस तरह की मौत यदि सेम डे मिली होती तो हम न केवल अपने बहादुर पुलिस की पीठ थपथपाते,पूरी कोशिश करते कि उस पर कुछ फूल बरसाएं। यूपी पुलिस ने यह मौका हमें नहीं दिया।इसका अफसोस रहेगा।
पांच दिन बाद विकास दूबे जब उज्जैन महाकाल मंदिर से गिरफ्तार हुआ तो हम जैसे तमाम लोगों को बड़ी आशा थी कि अब विकास दूबे तो मरेगा ही,विकास दूबे जैसों को पैदा करने वालों की भी पोल पट्टी खुलेगी। और देर सबेर वे भी मरेंगे। इस पोल पट्टी के खुलने से खाकी खादी और क्रिमनल के गठजोड़ का पर्दाफाश होता जिसे जनता भी देखती। विकास दूबे के अंत से ज्यादा जरूरी इस गठजोड़ का अंत था।जो नहीं हुआ। जबतक यह गठजोड़ आबाद रहेगा,दूबे जैसा “विकास” होता रहेगा।
इस गठजोड़ के अंत की उम्मीद हमें तब थी जब यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ हैं। हम इन्हें सत्ता के लालची नहीं कह सकते,और यह भी नहीं कि इनके लिए कुर्सी ही सब कुछ है। लेकिन शुक्रवार को सुबह जैसे ही खबर आई कि कानपुर पंहुचने के पहले पुलिस की वह गाणी पलट गई जिसमें दुर्दांत विकास को लाया जा रहा था।वह विकास जो महाकाल के मंदिर में बिल्कुल निहत्था था और चीख चीखकर कह रहा था मैं कानपुर वाला विकास दूबे हूं,गाणी पलटते ही पुलिस का असलहा छीनकर भागने लगा,फायरिंग करने लगा।पुलिस आत्मरक्षा की मुद्रा धारण की और बचाव में की गई फायरिंग में विकास दूबे ढेर हो गया। सचमुच अगर ऐसा ही हुआ तो कुछ नहीं कहना लेकिन यह सब यदि एक स्क्रिप्ट है तो कहना चाहूंगा कि यह एक ऐसे मुख्यमंत्री को धोखा देना हुआ जो वाकई राजनीति से अपराध के सफाया की साफ नियत रखता है। जो साफसुथरी राजनीति का पक्षधर हैं ही,कमसे कम कुर्सी के लिए राजनीति के अपराधी करण की इजाजत तो कत्तई नहीं देंगे?
जरायम के जरिए राजनीति के अंजुमन में कोई विकास का ही पहला कदम नहीं है।इसके पहले जरायम की दुनिया के एक से एक नाम है जो सफल राजनितिज्ञ सिद्ध हुए हैं।अब राजनीति में मुकाम हासिल किए हुए ऐसे नामचीनों से क्या बिना अपराध के राजनीति की उम्मीद की जा सकती है?विकास दूबे का एक पुराना इंटरव्यू दिखाया गया जिसमें उसने चौबेपुर के कई बार विधायक और विधानसभा का स्पीकर रहे हरिकृष्ण श्रीवास्तव को अपना राजनीतिक गुरू बताया था।यह शायद उतना चौकाने वाला नहीं था लेकिन अब जो अपने राजनीतिक आकाओं का नाम वह उगलता, उससे मौजूदा राजनीति की चूलें हिलने का खतरा था,खूनी राजनीति का पर्दाफाश भी होता। यह पर्दा हटने से रह गया। कानपुर कांड में शहीद सीओ के उस पत्र की परत दर परत भी खुलने से रह गई जो उन्होंने विकास दूबे और पुलिस गठजोड़ को इंगित करते हुए एसएसपी को लिखी थी। पूर्व में अपराधी के हाथों और पुलिसकर्मियों के हत्या की घटनाओं को देखें तो उसमें भी पुलिस की गद्दारी सामने आई है। इसमें दरोगा कक्कनराम व डीएसपी केपी सिंह हत्या कांड को याद किया जा सकता है। विकास दूबे के मामले में भी एक दरोगा की भूमिका सामने आई है, वह गिरफ्तार है लेकिन शहीद सीओ के पत्र की अनदेखी पुलिस के ऊपर की कुर्सी तक हुई।क्या अब भी इसपर से पर्दा उठने की गुंजाइश शेष है? और तो और विकास दूबे के राजनीतिक आंकाओ,वे चाहे जिस दल के हों,वे भी बेनकाब होंगे? निस्संदेह विकास दूबे का तो अंत हो गया लेकिन क्या इससे खाकी,खादी और क्रिमनल के बहुत बड़े सिंडिकेट का भी अंत हुआ?विकास दूबे तो मारा गया लेकिन यह एक सवाल है जो कभी नहीं मर सकता?
नोट : ये लेखक के निजी विचार हैं.





